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विभाजन से पहले
नई दिल्ली
Updated Mon, 28 Apr 2014 08:07 PM IST
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आंध्र प्रदेश के विभाजन से पहले वहां यह आखिरी चुनाव है, क्योंकि दो जून को तेलंगाना एक नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आ जाएगा। वहां लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव भी हो रहे हैं और इनके नतीजों के आधार पर ही तेलंगाना और सीमांध्र को नई सरकारें मिलनी वाली हैं, लिहाजा इन चुनावों का महत्व समझा जा सकता है।
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तेलंगाना वाले हिस्से की 17 लोकसभा और 117 विधानसभा सीटों के लिए 30 अप्रैल को और सीमांध्र वाले हिस्से की 25 लोकसभा सीटों और 175 विधानसभा सीटों के लिए सात मई को मतदान होना है। वास्तव में आंध्र के विभाजन ने राज्य के तमाम राजनीतिक समीकरण उलट-पुलट दिए हैं और हालत यह है कि जिस कांग्रेस को पिछली बार आंध्र प्रदेश से लोकसभा की सर्वाधिक 33 सीटें मिली थीं, वहां उसे मुश्किल दौर से गुजरना पड़ रहा है।
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दरअसल उसे दोहरी मार पड़ी है। रायलसीमा और तटीय आंध्र में उसे विभाजन की वजह से विरोध का सामना करना पड़ रहा है, तो तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ उसका समझौता नहीं हो सका। हालांकि उसे तेलंगाना से ही उम्मीद है और वह इस नए राज्य के गठन का श्रेय लेना चाहेगी। मगर बीते एक दशक में तेलंगाना के लिए टीआरएस ने बड़ा आंदोलन किया, और चंद्रशेखर राव खुद को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर तेलुगू देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडु और भाजपा के बीच गठजोड़ जरूर हुआ है, मगर उन्हें इसका फायदा सीमांध्र में अधिक हो सकता है।
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वाईएसआर कांग्रेस उनके लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि जगन मोहन रेड्डी विभाजन के विरोध में चंद्रबाबू से कहीं अधिक मुखर थे। इसके अलावा सीमांध्र में भाजपा को भी संदेह की नजर से देखा जाता है, क्योंकि उसकी सहमति के बिना तेलंगाना का गठन नहीं हो सकता था। वास्तव में सीमांध्र में जगन रेड्डी खुद को न सिर्फ मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर रहे हैं, बल्कि तेलंगाना के विकास के लिए अपनी बहन के नेतृत्व में पदयात्रा का ऐलान भी कर चुके हैं।
भाजपा को पिछली बार आंध्र से एक भी सीट नहीं मिली थी, मगर नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनाने का सपना देख रही पार्टी टीआरएस और वाईएसआर कांग्रेस को भी संभावित सहयोगियों के रूप में देख रही हो, तो हैरत नहीं।