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गतिरोध से आगे निकलें
नई दिल्ली
Updated Thu, 27 Nov 2014 07:54 PM IST
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नेपाल की राजधानी काठमांडू में 18वें दक्षेस शिखर सम्मेलन के आखिरी दिन भारत-पाकिस्तान में रिश्तों की बर्फ पिघली और लगभग अंतिम क्षणों में सिर्फ ऊर्जा समझौते पर सहमति बन पाई, तो इसी से समझा जा सकता है कि स्थापना के करीब तीन दशक बाद भी यह क्षेत्रीय संगठन लक्ष्यों से कितना दूर खड़ा है। दक्षिण एशिया के आठ देशों को मिलाकर यह संगठन बना है, पर शुरुआत से ही इस पर भारत-पाकिस्तान के आपसी रिश्तों की छाया इस कदर पड़ी है कि कई बार दक्षेस इस गतिरोध का बंधक बना नजर आता है।
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इसमें शक नहीं कि इस बार पाकिस्तान का रवैया शुरू से असहयोग भरा था। नवाज शरीफ ने पहले भारत द्वारा लाए गए सड़क और रेलमार्ग प्रस्तावों पर मंजूरी देने से आनाकानी की; जिन पर अब तीन महीने बाद विदेश मंत्रियों के स्तर पर फैसला होना है, बाद में आतंकवाद पर चुप्पी साधकर अपना इरादा और साफ कर दिया, जबकि बैठक का पहला दिन मुंबई हमले की आठवीं वर्षगांठ था, और भारत के साथ अफगानिस्तान तथा श्रीलंका के राष्ट्रपतियों ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता मंच से दोहराई।
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पर ऐसी बैठकों में खुद हमें भी एक जिम्मेदार राष्ट्र की तरह व्यवहार करना चाहिए। ठीक है कि दक्षेस के कई देशों के साथ हमारे दोतरफा रिश्ते लगातार बेहतर हो रहे हैं; इस बार भी नेपाल के साथ कई समझौते हुए हैं। पर बड़े भाई जैसा व्यवहार करने के बजाय सबको साथ लेकर चलना अच्छा होगा। यह जरूर थोड़ा आश्वस्तकारी है कि चीन को पर्यवेक्षक के बजाय दक्षेस का सदस्य बनाने का पाकिस्तान का प्रस्ताव सिरे नहीं चढ़ा, पर इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि कई सदस्य देश दक्षेस में चीन की बड़ी भूमिका के हिमायती हैं। लिहाजा जरूरी यह है कि आपसी राजनीतिक विवादों को दरकिनार कर दक्षिण एशियाई आर्थिक सहयोग को गति देने के लिए काम किया जाए।
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दक्षेस देशों का आपसी व्यापार आज कुल जीडीपी के एक प्रतिशत से अधिक नहीं है, जबकि आर्थिक मामले में इससे छोटे आसियान देशों का आपसी व्यापार इनकी कुल जीडीपी का करीब 10 फीसदी है! ऊर्जा समझौते को मंजूरी बिजली के क्षेत्र में साझा सहयोग के लिहाज से वाकई बहुत महत्वपूर्ण है, पर इससे आगे दक्षेस बैंक और साझा सैटेलाइट स्थापित करने तथा स्वास्थ्य और व्यापार को गति देने के लिए बहुत काम करना पड़ेगा।