फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Battle for Delhi

दिल्ली की जंग

Mon, 12 Jan 2015 07:23 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 12 Jan 2015 07:23 PM IST
विज्ञापन
Battle for Delhi

तकरीबन एक वर्ष से राजनीतिक अनिश्चितता से गुजर रही दिल्ली में अंततः चुनाव आयोग ने चुनाव कराने का ऐलान कर दिया है। राजनीतिक स्थिरता हासिल करने के लिए चुनाव से बेहतर कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। लोहिया ने तो कहा था कि जिंदा कौमें पांच वर्ष इंतजार नहीं करतीं। वाकई बीता एक वर्ष ही दिल्ली वालों के लिए काफी लंबा साबित हुआ है।

विज्ञापन


मगर यह भी सच है कि इस दौरान देश की सियासत में काफी बदलाव आया है और जो कांग्रेस कभी इस सियासत का केंद्र होती थी, वह हाशिये पर चली गई और उसकी जगह भाजपा ने ले ली है। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि देश की सियासत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द सिमट गई, जिनके नेतृत्व में भाजपा ने पहले लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की और उसके बाद पिछले कुछ महीनों के दौरान महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में सत्ता हासिल की और जम्मू-कश्मीर के चुनाव में प्रभावी जीत दर्ज की है।
विज्ञापन


जाहिर है, दिल्ली में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा नरेंद्र मोदी ही होंगे। तो दूसरी ओर नई तरह की राजनीति के वायदे के साथ पहली बार चुनाव में उतरकर दिल्ली का मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी है। केजरीवाल और उनके साथियों को भी एहसास होगा कि महज 49 दिनों की सरकार चलाकर उन्होंने घूसखोरी पर रोक भले लगाई हो, लेकिन जिस तरह से उन्होंने लोकपाल के मुद्दे पर इस्तीफा दे दिया था, वह राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण नहीं था। इसका विपरीत असर उनके समर्थकों और मतदाताओं पर पड़ा और यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि उनकी माफी का कितना असर दिल्ली वालों पर हुआ है!
विज्ञापन
विज्ञापन


बात सिर्फ यही नहीं, आप का मुकाबला सिर्फ भाजपा से नहीं, बल्कि मोदी के रूप में ऐसे नेता से भी है, जिसे विकास और निवेश का वाहक माना जाता है। खुद मोदी ने भाजपा के चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए बीते शनिवार को रामलीला मैदान से जिस तरह से आम आदमी पार्टी और उसके नेता पर हमले किए थे, उससे भी जाहिर होता है कि भाजपा भी इस चुनाव को 'मोदी बनाम केजरीवाल' ही रखना चाहती है। इस चुनाव में दोनों व्यक्तित्वों के बीच टकराव दिख सकता है, लेकिन अंततः दस फरवरी को आने वाला फैसला बिजली, पानी, आवास, महिला सुरक्षा और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने जैसे स्थानीय मुद्दों पर ही टिका होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed