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दिल्ली की जंग
नई दिल्ली
Updated Tue, 09 Sep 2014 08:13 PM IST
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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बीते कई महीने से जारी राजनीतिक गतिरोध को जल्दी खत्म किए जाने की जरूरत है। फरवरी में अरविंद केजरीवाल सरकार के इस्तीफा देने के बाद से दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लागू है, लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक नहीं रखी जा सकती। अंततः दिल्ली के लोगों को एक चुनी हुई सरकार की जरूरत है, जो उनकी आवश्यकताओं को पूरा कर सके।
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आज आम आदमी पार्टी भले ही तेजी दिखा रही है, लेकिन यदि दिल्ली में राजनीतिक गतिरोध कायम है, तो यह जानना भी जरूरी है कि इसकी शुरुआत आप सरकार के महज 49 दिनों में इस्तीफा देने से हुई थी। उस वक्त केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए को दिल्ली में तुरंत चुनाव कराने के बजाय उसे उपराज्यपाल के हवाले करना सियासी रूप से माकूल लगा था।
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फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सर्वाधिक सीटें जीतने वाली भाजपा ने उस वक्त सरकार बनाने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया था कि उसके पास जरूरी बहुमत नहीं है! ऐसे में दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने की उसकी बेताबी हैरान करने वाली है। लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली विधानसभा के गणित में कोई खास फर्क नहीं आया है। भाजपा के तीन विधायकों के सांसद बनने के बावजूद वह सबसे बड़ा दल जरूर है, पर यदि उसे सरकार बनाने का मौका दिया गया, तो उसे दूसरे विधायकों की मदद की जरूरत होगी।
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आप ने एक भाजपा नेता द्वारा कथित तौर पर उसके विधायकों को खरीदने की पेशकश का जो स्टिंग किया है, उसकी सच्चाई में न भी जाएं, तो भी इस आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता कि विधायकों को तोड़े बगैर दिल्ली में सरकार का गठन मुश्किल है।
उपराज्यपाल नजीब जंग द्वारा शुरू की गई सरकार गठन की ताजा पहल पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत तक ने कहा है कि वहां यदि सरकार बनाने के लिए जल्दी कदम नहीं उठाए गए, तो खरीद-फरोख्त को बढ़ावा मिल सकता है। इस मामले में अब 10 अक्तूबर को सुनवाई होनी है, मगर सुनवाई कर रही संविधान पीठ ने यह भी साफ कर दिया है कि राष्ट्रपति चाहें, तो उससे पहले भी कोई फैसला कर सकते हैं।
इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि सर्वोच्च अदालत की पीठ ने स्पष्ट किया है कि सरकार के गठन से संबंधित कोई भी फैसला न्यायपालिका को नहीं, कार्यपालिका को ही लेना है। जाहिर है, गेंद अब केंद्र सरकार के पाले में है।