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बर्बर और शर्मनाक

Thu, 10 Sep 2015 07:55 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 10 Sep 2015 07:55 PM IST
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Barbaric and shameful

सऊदी अरब के एक राजनयिक के गुड़गांव स्थित आवास से मुक्त कराई गई दो नेपाली महिलाओं ने उनके साथ हुई ज्यादतियों की जो कहानी बताई है, उसे कोई भी सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता। छह महीने पहले नेपाल में आए भयावह भूकंप के बाद फिर से जिंदगी को जोड़ने की कोशिश में लगी इन महिलाओं के लिए रोजगार की तलाश में अपना घर-बार छोड़ना किसी आपदा से कम साबित नहीं हुआ।

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गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे नेपाल की महिलाएं और पुरुष भारत और खाड़ी के देशों में घरेलू कामगार या ऐसे ही छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हैं। प्लेसमेंट एजेंसियों के जरिये इनमें से बहुत कम लोगों को ही वैध तरीके से रोजगार मिल पाता है। इन महिलाओं को भी किसी प्लेसमेंट एजेंसी के जरिये सऊदी अरब के राजनयिक के घर पर काम दिए जाने का झांसा दिया गया था, लेकिन कथित तौर पर न केवल उस राजनयिक ने, बल्कि उनके अनेक साथियों ने इन दोनों महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया। यहां तक कि उन्हें ठीक से भोजन और कपड़े तक भी नहीं दिए जाते थे। यह मामला सऊदी अरब, भारत और नेपाल, यानी तीन देशों से जुड़ा हुआ है, लिहाजा इसमें कई तरह की कानूनी अड़चनें और राजनयिक संबंध आड़े आ रहे होंगे।
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मगर असल सवाल यह है कि उन महिलाओं को न्याय कैसे मिले? यह विडंबना ही है कि सऊदी अरब का दूतावास बलात्कार के मामले में लिप्त अपने एक अधिकारी का 1961 की उस विएना संधि की आड़ में बचाव कर रहा है, जिसके मुताबिक संबंधित देशों में तनावपूर्ण संबंध होने की स्थिति में किसी राजनयिक को यह छूट दी जाती है, कि वह अपनी जिम्मेदारियों का बिना किसी भय के निर्वहन कर सके। जाहिर है, इसका यौन उत्पीड़न के मामले से कोई लेना-देना नहीं है। अच्छा होता कि सऊदी अरब अपने अधिकारी और उसके साथियों के खिलाफ खुद ही कार्रवाई करता। वैसे भी यह कोई पहला मामला नहीं है, भारत स्थित नेपाली दूतावास ने भूकंप के तुरंत बाद अवैध तरीके से सऊदी अरब और दूसरे देशों में भेजी जा रही 29 महिलाओं को मुक्त कराया ही था। वास्तव में दक्षिण एशियाई देशों से खाड़ी के देशों में महिलाओं की तस्करी आम है, जिसे रोकने के लिए सख्त अंतरराष्ट्रीय संधि की जरूरत है।
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