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सत्ता के मद में डूबे लोग
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 23 Jul 2014 07:46 PM IST
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राजधानी दिल्ली स्थित महाराष्ट्र सदन में मराठी भोजन की गुणवत्ता से नाराज शिवसेना के एक सांसद ने आईआरसीटीसी के एक कर्मचारी के मुंह में जिस तरह बार-बार रोटी ठूंसी, वह सामान्य स्थिति में ही बेहद अपमानजनक है। उस कर्मचारी ने चूंकि रोजा रखा था, ऐसे में, उसके मुंह में जबरन रोटी ठूंसने की कोशिश आपत्तिजनक भी है। इस पूरी घटना की वीडियो फुटेज उपलब्ध होने के बावजूद शिवसेना ने इसे जिस तरह झूठ बताया है, वह बेहद आश्चर्यजनक है।
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महाराष्ट्र सदन में व्याप्त अव्यवस्था के बारे में उनकी शिकायत सही हो सकती है। आईआरसीटीसी द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता के बारे में भी उनका क्षोभ वाजिब हो सकता है। इसके बावजूद सांसदों के समूह ने रसोई में घुसकर एक कर्मचारी को जिस तरह अपमानित किया, उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। यह मान लिया कि उन्हें उस कर्मचारी के रोजेदार होने की जानकारी नहीं थी। इसके बावजूद उस कर्मचारी के साथ उनके आचरण को क्या जायज और जनप्रतिनिधियों की गरिमा के अनुरूप माना जा सकता है? बल्कि उनका यह व्यवहार तो सत्ता के मद में डूबे जनप्रतिनिधियों के निरंकुश आचरण का ही एक और उदाहरण है।
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संसद में यह मुद्दा उठने पर घटक दल के बचाव में भाजपा के रमेश विधूड़ी ने जो टिप्पणी की, वह भी उतनी ही गैरजिम्मेदार थी। अपने वक्तव्य के लिए बाद में बेशक उन्होंने सदन से माफी मांग ली है, पर इस तरह के विवादों से बचने के लिए उन्हें अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से कुछ सीखना चाहिए, जिन्होंने जनप्रतिनिधियों के आचरण को गलत बताने में एक मिनट नहीं लगाया।
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लेकिन शिवसेना इस मामले में संवेदनशीलता का परिचय देने के बजाय पूरे मुद्दे को गलत और विधानसभा चुनाव से पहले अपने खिलाफ राजनीतिक साजिश बताने में लगी हुई है। उद्धव ठाकरे की यह टिप्पणी ही बहुत कुछ कह जाती है कि हिंदुत्ववादी पार्टी होने के बावजूद शिवसेना किसी धर्म का अपमान नहीं करती! सवाल यह है कि मानवीयता के जिस आधार पर महाराष्ट्र सदन ने उस कर्मचारी से खेद प्रकट किया है, मानवीयता के उसी तकाजे से क्या शिवसेना को भी इस मामले में संवेदना का परिचय नहीं देना चाहिए? उस कर्मचारी से माफी मांगकर और दोषी सांसदों के खिलाफ कार्रवाई करके ही शिवसेना अपने ऊपर लगा यह दाग मिटा सकती है।