पिछड़े राज्यों की दस्तक

नई दिल्ली Updated Wed, 12 Jun 2013 09:03 PM IST
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राजनीति के केंद्र से अक्सर दूर रहने वाले ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक अपने राज्य को विशेष दर्जा देने की मांग को दिल्ली तक ले आए हैं, तो इसके पीछे राज्य का पिछड़ापन तो बड़ा कारण है ही; उस सियासत को भी समझने की जरूरत है, जिसने उन्हें इसके लिए मजबूर किया।
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बिहार और उत्तर प्रदेश के नेता तो दिल्ली आकर अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास कराते ही रहे हैं, लेकिन संभवतः ऐसा पहली बार हुआ कि ओडिशा के हजारों लोग दिल्ली में जुटे।
बेशक विशेष दर्जे की मांग करने वाला ओडिशा अपवाद नहीं है, पर उसकी इस मांग को सिर्फ दबाव की राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
असल में विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने या फिर राज्यों को विशेष मदद देने में अक्सर राजनीति की जाती है, जिसका शिकार ओडिशा भी हुआ है।

मसलन, राज्य के अति पिछड़े कालाहांडी-बोलांगीर-कोरापुट (केबीके) क्षेत्र के लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ) से सालाना 250 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। जबकि मौजूदा राजनीति में यूपीए को अनुकूल लग रहे बिहार को 12,000 करोड़ की मदद को मंजूरी दी!

असल में 1969 में पांचवें वित्त आयोग ने अतिपिछड़ापन, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और सामाजिक मुद्दों को ध्यान में रखकर कुछ राज्यों को विशेष दर्जा दिए जाने का प्रावधान किया था। मगर इसकी आड़ में होने वाली राजनीति के चलते ऐसे राज्यों की संख्या बढ़कर 11 हो चुकी है।

इसका एक बड़ा कारण यही है कि जिन राज्यों को ऐसा दर्जा मिलता है, उन्हें केंद्रीय योजनाओं में 90 फीसदी अनुदान केंद्र से मिल जाता है और टैक्स में भी उन्हें छूट मिलती है।

संघीय ढांचे में यह जरूरी है कि सभी राज्यों को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें, पर राजनीति के चलते यह प्रावधान केंद्र और राज्यों के बीच खींचतान का कारण बन गया है। जिस तरह से विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग बढ़ रही है, उससे यह जरूरी हो गया है कि इसके प्रावधानों और इसकी पात्रता में व्यावहारिक बदलाव लाया जाए।

बेशक रघुराम राजन की अगुआई वाली कमेटी इस दिशा में काम कर रही है, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि इसकी आड़ में किसी तरह की सियासत न हो।
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