राजनीति के मुश्किल मैदान में

Ashok Kumar Updated Wed, 03 Oct 2012 03:34 PM IST
at hard ground of politics
ठीक गांधी जयंती के दिन अपनी राजनीतिक पार्टी की घोषणा कर अरविंद केजरीवाल ने जहां प्रतीकात्मक संदेश देने की कोशिश की है, वहीं उनकी पार्टी का नीति पत्र आम आदमी की बेहतरी की बात करता है। चुने गए जनप्रतिनिधियों के लाल बत्ती, सरकारी बंगला और सुरक्षा से दूर रहने, पिछड़ों और दलितों को आरक्षण का लाभ देने, मुसलमानों के लिए शिक्षा और रोजगार के बराबर मौके उपलब्ध कराने, गरीबों के लिए सबसिडी बढ़ाने, भ्रष्टाचार और महंगाई दूर करने तथा जनप्रतिनिधियों को खारिज करने तथा उन्हें वापस बुलाने का कानून बनाने जैसे प्रावधान बताते हैं कि यह राजनीतिक पार्टी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की हामी है।

खुद अरविंद केजरीवाल के जीवट के बारे में किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। जनलोकपाल के पक्ष में अन्ना हजारे द्वारा शुरू किए जनांदोलन के वह शुरुआती सिपाहियों में रहे ही, अब उस आंदोलन की गर्भ से उपजने वाले राजनीतिक पार्टी को आकार देने का काम भी वही कर रहे हैं। लेकिन आंदोलन को एक सफल राजनीतिक अभियान में बदलना आसान नहीं होता।

अपने यहां व्यवस्था बदलने की कोशिशें इससे पहले भी हुईं, पर वे परवान नहीं चढ़ पाईं। फिर लोकतंत्र की स्थापित संस्थाओं के प्रति अवज्ञा और आम जनता के प्रति जो भोली प्रतिबद्धता अन्ना के आंदोलन में दिखाई देती थी, वे यहां भी हैं। तमाम राजनीतिक दलों को निशाना बनाने के बाद आखिरकार एक राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला चाहे जितना भी जरूरी हो, अंततः यह उसी व्यवस्था का एक हिस्सा बन जाना होगा। जबकि खुद अन्ना राजनीति में जाने की सीमाएं जानते हैं।

केजरीवाल कहते हैं कि अगले साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी हिस्सा लेगी। पर आज चुनावी प्रक्रिया जितनी खर्चीली हो गई है, उसमें तमाम पार्टियों और कॉरपोरेट घरानों की आलोचना करते हुए केवल ईमानदारी के बूते सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने के लिए धन जुटाना ही मुश्किल चुनौती है। तिस पर न सिर्फ उनके प्रेरणास्रोत अन्ना हजारे इस अभियान में उनके साथ नहीं हैं, बल्कि अन्ना आंदोलन के कई साथी भी अपना रास्ता बदल चुके हैं। ऐसे में, आंदोलनकारी से राजनेता की अपनी नई भूमिका न तो खुद अरविंद केजरीवाल के लिए आसान होगी, न उनकी राजनीतिक पार्टी के लिए।       

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