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फिर एक बोफोर्स?
नई दिल्ली
Updated Wed, 13 Feb 2013 12:07 AM IST
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इटली की एक कंपनी से 12 हेलीकॉप्टरों की खरीद में दलाली के सिलसिले में राजधानी मिलान में हुई कुछ गिरफ्तारियां और इसी के साथ अपने यहां मामले की सीबीआई जांच के आदेश से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी यूपीए सरकार एक और मुश्किल में फंस गई है। करीब ढाई दशक पहले बोफोर्स दलाली ने हमारी सत्ता की चूलें हिला दी थीं; यह अलग बात है कि वायदों के बावजूद उसका सच सामने नहीं आ पाया।
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अब यह मामला बताता है कि रक्षा सौदों की खरीद में हम अब तक न सिर्फ पारदर्शिता नहीं बना पाए हैं, बल्कि इसमें होने वाली गड़बड़ियों को पकड़ पाने में भी पहले की तरह ही लाचार हैं। यह लाचारी तब और अक्षम्य है, जब एक मजबूत राष्ट्र के तौर पर उभरने के कारण विकसित देशों की हथियार लॉबियों के लिए भारत एक बड़ा बाजार बन चुका है।
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वे हमारी सैन्य ताकत मजबूत करने के लिए दबाव बनाने से लेकर घूस देकर हथियार बेचने का तरीका अपनाती हैं, और उनके फैलाए जाल में फंसना हमारी नियति ही बन गया है। इस मामले में भी हम तब जागे हैं, जब सौदेबाजी में दलाली के खिलाफ सुगबुगाहट इटली में हुई।
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कहा यह जाता है कि वहां यह पहल सत्ता से एक सियासी पार्टी के हटने से हुई, जिसने दलाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन अपने यहां इस दिशा में अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया था, जबकि यह मामला पिछले काफी समय से चर्चा में था। सिर्फ यही नहीं कि इस मामले में दलाली की रकम कई देशों के जरिये भारत आई है, लिहाजा मामला मनी लांड्रिंग का भी है, यह भी कि इन बिचौलियों में भारत में वर्षों से धंधा कर रहे कुछ इतालवी, ब्रिटेन के एक व्यापारी और एक पूर्व एयर चीफ मार्शल के रिश्तेदारों के बारे में बताया जा रहा है।
जाहिर है, रक्षा सौदों में बिचौलिये की भूमिका निभाने वाले सत्ता के गलियारों में बेरोकटोक घूमने वाले रसूखदार ही होंगे। लिहाजा मामले में सिर्फ सीबीआई जांच का आदेश देना काफी नहीं है, उन दलालों के नाम भी सामने आने चाहिए। इसी तरह मुद्दा रक्षा सौदों के लिए पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने का भी है। सच यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी खरीद प्रक्रिया को दलालों से दूर रखने में सरकार ने अभी तक ठोस प्रतिबद्धता का परिचय नहीं दिया है।