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सर्वोच्च अदालत के 1993 से 2010 के दौरान किए गए कोयला खदानों के सारे आवंटनों को अवैध बताने से साफ हो गया है कि इस कीमती प्राकृतिक संपदा की करीब दो दशकों तक कैसी लूट मची रही। निश्चय ही, जिन 218 आवंटनों की जांच हो रही है, उनमें से कई पिछली यूपीए सरकार के दस वर्ष के कार्यकाल के दौरान किए गए थे। मगर सर्वोच्च अदालत ने उससे पहले की अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार और संयुक्त मोर्चा सरकार के साथ ही, उस नरसिंह राव सरकार के समय किए गए आवंटनों को भी अवैध माना है, जिसने देश में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू कर तमाम क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया था।
दरअसल बिजली और इस्पात कंपनियों के लिए कोयले की बढ़ती मांग ने सरकारों पर दबाव भी बनाया और नतीजा एक ऐसे गठजोड़ के रूप में सामने आया, जिसने नियमों और कायदों को ताक पर रख दिया। इस दौरान दो तरह से खदानों का आवंटन किया गया था, पहला स्क्रीनिंग कमेटी के जरिये, जिसमें कोयला और अन्य मंत्रालयों के अधिकारियों के साथ ही संबंधित राज्य सरकारों के प्रतिनिधि शामिल थे और दूसरा सीधे सरकारों के द्वारा। अदालत ने इन दोनों तरीकों पर उंगली उठाई है और इन्हें मनमाना करार दिया।
आज भले ही कांग्रेस पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक विनोद राय की नीयत पर सवाल उठा रही है, मगर उनकी रिपोर्ट सामने न आती, तो इस घोटाले का शायद पता ही नहीं चलता। जाहिर है, सर्वोच्च अदालत के इस कदम से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की परेशानी बढ़ सकती है, क्योंकि इनमें से सर्वाधिक आवंटन उस दौरान किए गए थे, जब कोयला मंत्रालय उनके पास था। सर्वोच्च अदालत की बेंच ने संकेत दिए हैं कि उसके इस कदम से होने वाले परिणामों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त जज की अगुआई में कमेटी बनाई जा सकती है।
इसके साथ ही यह भी देखने की जरूरत है कि प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन को लेकर भी पारदर्शी नीति बनाई जाए। जाहिर है, यह नीति कार्यपालिका को बनानी है, जैसा कि खुद सर्वोच्च अदालत की पांच जजों की पीठ ने सितंबर, 2012 में प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन पर उठे सवालों पर स्पष्ट किया था। उस पीठ ने जिन दो कसौटियों का जिक्र किया था, उन्हें सर्वोच्च अदालत के ताजा फैसले में भी देखा जा सकता है, 'निष्पक्षता और न्यायसंगतता'।