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अखिलेश की सोशल इंजीनियरिंग

Wed, 15 May 2013 02:45 PM IST
Updated Wed, 15 May 2013 02:45 PM IST
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akhilesh yadav's social engineering

उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने परशुराम जयंती के बहाने जिस तरह ब्राह्मणों को रिझाने की कोशिश की, उससे लगता है कि सपा पिछड़ों और मुस्लिमों के अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ ही नया आधार तलाश रही है।

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उसे कदाचित इसकी जरूरत इसलिए है, क्योंकि अभी जिस तरह का राजनीतिक माहौल है, उसमें सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को लगता है कि परिदृश्य उनके अनुकूल है और वह आगामी चुनावों के बाद निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। उनकी पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर देख ही रही है, इसलिए जरूरी है कि वह सूबे से अधिक से अधिक सीटें हासिल करें।
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हालांकि अभी कहा नहीं जा सकता कि ब्राह्मणों को रिझाने की उनकी सोशल इंजीनियरिंग कितना काम आती है। मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि 14 फीसदी वोटों के साथ सूबे की 80 सीटों में से 20 पर इस समुदाय का दबदबा है। जातियों और समुदायों के साथ वोट बैंक के खांचों में बंटे उत्तर प्रदेश में इसका महत्व समझा जा सकता है।
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दरअसल मायावती ने इसे सबसे पहले समझा था, जिसका फायदा उन्हें 2007 के विधानसभा चुनावों में भी हुआ था। उनकी यह राजनीति बसपा के उस नारे से ही अलग थी, जिसके सहारे उसने अपनी जड़ें मजबूत की थी। यह अलग बात है कि यह सोशल इंजीनियरिंग पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में काम नहीं आई, लेकिन उनका भरोसा अब भी इस वर्ग से टूटा नहीं है।

यों ब्राह्मणों को भाजपा का पारंपरिक समर्थक माना जाता रहा है, शायद इसीलिए सपा को लगता है कि यदि ब्राह्मण बसपा से छिटक कर कहीं भाजपा के पाले में चले गए, तो उसकी अपनी सीटों का गणित गड़बड़ा सकता है। ब्राह्मणों को लेकर चल रही होड़ का अंदाजा इससे भी लग सकता है कि आम चुनाव अभी भले ही दूर हैं, लेकिन सपा ने उन्हें 22 सीटें और बसपा ने 21 सीटें दे रखी हैं!


अखिलेश सरकार ने मायावती को निशाना बनाते हुए बसपा कार्यकाल में ब्राह्मणों के खिलाफ दलितों के उत्पीड़न से संबंधित कथित फर्जी मामलों को वापस लेने का ऐलान किया है। यह एक तीर से दो निशाना साधने जैसा है। मगर यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि सोशल इंजीनियरिंग समाज को जोड़ने के लिए हो, तोड़ने के लिए नहीं।

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