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छवि से बेखबर चुनावी चिंता
नई दिल्ली
Updated Thu, 07 Feb 2013 11:58 PM IST
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सत्ता में एक साल पूरे होने के लगभग एक महीना पूर्व उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के पहले मंत्रिमंडल विस्तार को वैसे तो एक रूटीन कवायद की तरह ही देखना चाहिए। शुरुआत में अड़तालीस मंत्रियों के शपथ लेने, फिर एक मंत्री के निधन और दूसरे मंत्री को हटा दिए जाने के बाद मंत्रिमंडल विस्तार की गुंजाइश तो खैर थी ही।
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नए मंत्रियों के चयन में युवा चेहरों पर भरोसा करते हुए जिस तरह ब्राह्मणों को तरजीह दी गई है, उसे लोकसभा चुनाव के लिए जल्दी मचा रहे मुलायम सिंह के बयानों से जोड़कर देखें, तो लगता है कि भाजपा और बसपा को टक्कर देने के लिए सपा वाकई व्यूह रचना में जुट गई है।
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लोकप्रियतावादी बजट पेश करने के बाद चुनाव को भुनाने के कांग्रेसी इरादे और कुंभ में हिंदुत्व की अलख जगाकर चुनावी फायदा लेने की भाजपाई मंशा की आलोचना कर सपा जता रही है कि वह चुनाव के लिए तैयार तो है ही, इन दोनों को कड़ी टक्कर देने का भी माद्दा रखती है। यह चुनावी तैयारी ठीक है, पर सूबे में करीब एक साल के उसके शासन का अनुभव अच्छा नहीं है।
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सांप्रदायिक हिंसा पर अंकुश लगाने में शुरुआती विफलता, नौकरशाही को ताश के पत्ते की तरह फेंटने की आदत, बदतर कानून-व्यवस्था और निचले स्तर पर सत्ता के दुरुपयोग के मामले इतने अधिक हैं कि कई बार मुलायम सिंह को टिप्पणी करनी पड़ी है। परिवारवाद के लिए कांग्रेस को निशाना बनाने वाली सपा के सरकार में भी परिवार और जाति पर कुछ ज्यादा ही मेहरबानी दिखती है।
यानी सार्वजनिक तौर पर आप जिस प्रवृत्ति की आलोचना करते हैं, व्यावहारिक तौर पर खुद को भी उससे अलग नहीं कर पाते। विवादास्पद छवि के लोगों से जुड़ाव भी खुद सपा की छवि के लिए ठीक नहीं, चाहे वह गन्ना शोध संस्थान के विवादास्पद उपाध्यक्ष को बचाने के लिए एसपी को हटा देने का मामला हो या मंत्रिमंडल विस्तार में दागियों को चुनने का।
जिस मंत्री को एक सीएमओ के अपहरण के आरोप में हटा दिया गया था, उनकी न सिर्फ वापसी दुखद है, बल्कि मुख्यमंत्री द्वारा उनका बचाव करना और भी दुर्भाग्यपूर्ण है। सपा को भूलना नहीं चाहिए कि खराब होती छवि का चुनाव में उसे नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।