फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Ahead of symbols

प्रतीकों से आगे

Thu, 02 Oct 2014 06:58 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 02 Oct 2014 06:58 PM IST
विज्ञापन
Ahead of symbols

महात्मा गांधी ने 1925 में जब यह कहा था कि देश की स्वतंत्रता से कहीं अधिक जरूरी स्वच्छता है, तो उस समय की परिस्थितियां आज से एकदम भिन्न थीं। उस वक्त देश में आयु प्रत्याशा 35 वर्ष से भी कम थी और हैजा, अतिसार, मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियां बच्चों की मौत का बड़ा कारण थीं।

विज्ञापन


गांधी ने 90 वर्ष पूर्व जिस मुद्दे की ओर ध्यान खींचा था, उसकी ओर दुनिया का ध्यान 90 के दशक में तब गया, जब संयुक्त राष्ट्र ने इसे अभियान की तरह लिया। वास्तव में इन बीमारियों का संबंध प्रदूषित पानी और गंदगी से है। हालांकि भारत के संदर्भ में स्वच्छता का मुद्दा छुआछूत और जाति तथा वर्ण व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है, जिसके बारे में गांधी का मानना था कि सफाई का काम करनेवाले और मैला ढोने वाले वर्ग के उत्थान के बिना असमता को दूर नहीं किया जा सकता।
विज्ञापन


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी की 145वीं जयंती के मौके पर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत कर स्वच्छता को लेकर व्यक्तिगत तौर पर खुद की और सरकार की प्रतिबद्धता को ही प्रदर्शित किया है। पांच वर्ष तक चलने वाले 62,000 करोड़ के इस अभियान में ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता के लिए पिछली सरकार द्वारा ग्रामीण भारत की स्वच्छता के लिए शुरू किए गए निर्मल भारत अभियान को भी जोड़ दिया गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन


वाकई यह शर्मनाक है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 60 फीसदी घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि खुले में शौच करने वालों की संख्या भारत में सर्वाधिक है। अब यह बात सामने आ चुकी है कि भारत में कुपोषण और अनेक बीमारियों की जड़ गंदगी और खुले में शौच करने की मजबूरी में छिपी है। इस चुनौती से निपटने के लिए झाड़ू लगाने की प्रतीकात्मकता से आगे जाकर काम करने की जरूरत है।


कहीं ऐसा तो नहीं कि महज पश्चिम और अमेरिका के चमचमाते शहरों से प्रभावित होकर हम इस अभियान के जरिये अपने शहरों को भी उन जैसा देखना चाहते हैं! ध्यान रहे, आज भी भारत में गंदगी, तिरस्कार और उपेक्षा का शिकार वही तबका है, जिसके जिम्मे हमने साफ-सफाई की जिम्मेदारी डाल रखी है। जाहिर है, एक बड़ी चुनौती मन की स्वच्छता से भी जुड़ी हुई है, जिसकी सफाई के लिए गांधी जिंदगी भर खुद को कसौटी पर कसते रहे। क्या हम ऐसा कर पाएंगे?

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed