समझौते से आगे
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केंद्र की एनडीए सरकार और नगा अलगाववादी संगठन एनएससीएन (इसाक-मुइवा) के बीच हुए समझौते को पूर्वोत्तर में शांति की स्थापना के लिहाज से मील का पत्थर कहा जा सकता है। हालांकि अभी इस समझौते की शर्तों और प्रावधानों का खुलासा नहीं किया गया है, लेकिन अपने आपमें यह महत्वपूर्ण है कि केंद्र सरकार और नगा संगठन के बीच 18 वर्षों से वार्ता के कई दौर चलने के बाद सहमति बन पाई है। वास्तव में स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद देश को जिन अलगाववादी आंदोलनों से जूझना पड़ा था, उनमें 'वृहत नगालैंड' का आंदोलन भी प्रमुख था। हालत यहां तक हो गई थी कि नगा अलगाववादी नेता फिजो ने देश से अलग होने के लिए रायशुमारी तक करवा ली थी!
अपनी विशिष्ट भौगोलिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की वजह से नगा आंदोलन को पड़ोसी देशों से भी मदद मिलती रही है। इसका असर पूर्वोत्तर के राज्यों के बीच आपसी टकराव के रूप में भी दिखा है। पिछले कुछ दशकों से नगा विद्रोही जिस ग्रेटर नगालैंड की बात कर रहे थे, उसमें मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और असम के नगा बहुल इलाकों को मिलाने की मांग शामिल थी। संभवतः इसी वजह से पूर्वोत्तर के इन राज्यों से इस समझौते पर काफी सतर्क प्रतिक्रियाएं आई हैं। खासतौर से मणिपुर की स्थिति पर गौर करने की जरूरत है, जहां चार जिलों में नगा आबादी का प्रभुत्व है। फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जून के महीने में एनएससीएन (खापलांग) ने मणिपुर में ही सेना की टुकड़ी पर हमला कर 18 जवानों को मार डाला था। जाहिर है, वहां खापलांग जैसे गुट अब भी सिरदर्द हैं।
अलगाववादी आंदोलनों की वजह से ही पूर्वोत्तर विकास की मुख्यधारा से अब तक नहीं जुड़ सका है। 85 वर्षीय इसाक चिसी और 78 वर्षीय मुइवा के लिए तो यह ऐतिहासिक पल है ही, जिन्होंने धैर्य के साथ ही भारतीय संविधान के दायरे में स्वायत्तता की बात कर समझदारी का परिचय दिया है, इस समझौते ने दूसरे अलगाववादी संगठनों को भी राह दिखाई है। नवंबर, 1975 में नगा विद्रोहियों और केंद्र सरकार के बीच हुआ शिलांग समझौता जल्दी दम तोड़ गया, क्योंकि विभिन्न गुट इसे मानने को तैयार नहीं थे। पर अब परिस्थितियां बदल गई हैं; नई पीढ़ी की चुनौतियां भी अलग हैं और सपने भी।