फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Age of convict

अपराधी की उम्र

Tue, 15 Jul 2014 07:59 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 15 Jul 2014 07:59 PM IST
विज्ञापन
Age of convict
इसी वर्ष मार्च में सर्वोच्च अदालत की तीन सदस्यीय बेंच ने किशोरों की उम्र घटाकर 16 वर्ष करने की याचिकाएं खारिज करते हुए किशोर न्याय अधिनियम को अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों के अनुरूप बताया था। मगर अब सर्वोच्च अदालत की ही एक बेंच ने केंद्र सरकार से जानना चाहा है कि हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे जघन्य मामलों में क्या आरोपी को सिर्फ इसलिए छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उसकी उम्र अभी 18 वर्ष नहीं हुई है!
विज्ञापन


जाहिर है, न्यायपालिका के इस रुख से किशोर अपराधियों की उम्र को लेकर नए सिरे से विमर्श का मौका मिला है। हालांकि दिसंबर, 2012 में दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद गठित जस्टिस जे एस वर्मा समिति ने किशोरों की उम्र घटाकर 16 वर्ष करने के सुझाव को अव्यवहारिक बताकर खारिज कर दिया था। मगर अभी केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने संकेत दिए हैं कि एनडीए सरकार किशोर न्याय अधिनियम में संशोधन कर किशोरों की उम्र सीमा 16 करना चाहती है, ताकि किशोर अपराधियों को भारतीय दंड संहिता के दायरे में लाया जा सके।
विज्ञापन


इसके लिए उनका तर्क है कि यौन अपराधों में से पचास फीसदी को 16 वर्ष या उससे अधिक उम्र के किशोर अंजाम देते हैं, जिन्हें किशोर न्याय अधिनियम की जानकारी होती है। इस कानून के तहत किसी भी अपराध में संलिप्त 18 वर्ष तक की उम्र के किशोरों के लिए अधिकतम तीन वर्ष की सजा का प्रावधान है और वह भी सुधार के रूप में। लेकिन यह भी सच है कि बाल सुधार गृह किशोर अपराधियों को सुधारने के मामले में कोई अच्छा उदाहरण पेश नहीं कर सके हैं। वहीं, दूसरा पक्ष यह भी है कि पिछले एक-डेढ़ दशक के दौरान जिस तेजी से प्रौद्योगिकी का विस्तार हुआ है और उसकी पहुंच बढ़ी है, उससे किशोरों की समझ और जानकारियां पहले जैसी सीमित नहीं रही।
विज्ञापन
विज्ञापन


बेशक, भारत किशोरों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की संधि से बंधा हुआ है, लेकिन ब्रिटेन और अमेरिका के कई प्रांतों में जघन्य अपराधों में किशोरों को वयस्क अपराधियों जैसी सजा देने के प्रावधान हैं। निश्चय ही, किशोर अपराध के सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पहलूओं को नजरंदाज नहीं किया जा सकता, मगर हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में 16 वर्ष या उससे अधिक उम्र के किशोरों की संलिप्तता को भारतीय दंड संहिता के दायरे में देखने पर तो विचार किया ही जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed