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आत्महत्या के विरुद्ध
नई दिल्ली
Updated Wed, 10 Dec 2014 08:40 PM IST
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जिस दौर में छोटी बातें और मामूली तनाव छोटे बच्चों तक को आत्महंता रास्ते पर जाने को दुष्प्रेरित करते हैं, उस समय आत्महत्या की कोशिश को जायज ठहराने का कोई भी प्रयास चौंकाने वाला ही माना जाएगा। भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को खत्म कर देने से अब होगा यह कि आत्महत्या की कोशिश में विफल रहने वाले व्यक्ति को सजा का सामना नहीं करना पड़ेगा।
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दरअसल इस तरह का व्यक्ति अपनी परेशानियों से मुक्ति के लिए जो उपाय चुनता है, उसमें सफल न होने पर पहले ही मानसिक अशांति और सामाजिक शर्मिंदगी का सामना करता है। तिस पर राज्य अगर उसके साथ अपराधी की तरह व्यवहार करना शुरू करे; उसे जुर्माना अदा करने के साथ जेल में भी रहना पड़े, तो यह सचमुच बेहद अमानवीय है। विधि आयोग ने वस्तुतः इसी अमानवीयता को खत्म करने की सिफारिश की थी, जिस पर अट्ठारह राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों की सहमति के बाद केंद्र सरकार ने मुहर लगाने का फैसला लिया है।
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इस प्रसंग में विधि आयोग की सदिच्छा और केंद्र सरकार की मानवीय पहल स्वागतयोग्य तो है, पर यह आत्महत्या को जायज ठहराने का प्रयास कदापि नहीं लगना चाहिए। बल्कि धारा 309 को खत्म करने के दूसरे खतरे भी हैं। आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से हटाए जाने से इसके पीछे के कारणों की तलाश भी मुश्किल हो सकती है। इसका असर विशेष रूप से कर्ज की वजह से खुदकुशी करने वाले किसानों और दहेज हत्याओं पर पड़ सकता है।
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बिहार, मध्य प्रदेश, सिक्किम जैसे राज्यों ने इसे खत्म करने का इस आधार पर विरोध किया है कि इससे राज्य सरकारों को ब्लैकमेल करने वालों, आमरण अनशन और आत्मदाह की बात करने वालों के हौसले बुलंद हो सकते हैं, लिहाजा कानूनन ऐसी कोई व्यवस्था होनी ही चाहिए, ताकि ऐसे लोगों को नियंत्रण में रखा जा सके। आत्मघाती हमलावरों की विश्वव्यापी पैठ के इस दौर में भी आत्महत्या की कोशिश को अपराध न मानने के खतरे होंगे।
देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले ये लोग सुबूत मिटाने की कोशिश में भी आत्महत्या का प्रयास करते हैं। ऐसे में, धारा 309 को खत्म करते हुए सरकार को ऐसे कानूनी प्रावधानों के बारे में भी सोचना ही होगा, जिससे अपराधियों, समाज-विरोधी तत्वों और आतंकवादियों को इसका लाभ न मिले।