भ्रष्टाचार के खिलाफ

नई दिल्ली Updated Tue, 06 May 2014 08:17 PM IST
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बड़े नौकरशाहों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए सरकार की पूर्व अनुमति की अनिवार्यता के प्रावधान को निरस्त करने वाला सर्वोच्च अदालत का फैसला सीबीआई को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम तो है ही, इसका असर सरकार के नीतिगत फैसलों पर भी दिखाई पड़ेगा।
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प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की उस विवादास्पद धारा छह-ए को असांविधानिक बताकर निरस्त कर दिया है, जिसके तहत संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच के लिए सक्षम प्राधिकार से अनुमति जरूरी होती थी।
सरकार की ओर से तर्क दिया जाता रहा है कि चूंकि संयुक्त सचिव और उसके ऊपर के अधिकारी नीति निर्धारण की प्रक्रिया और फैसलों से जुड़े रहते हैं, इसलिए उनके खिलाफ किसी भी तरह की जांच के लिए अनुमति जरूरी है। मगर सवाल है कि जिन नीतियों के कारण बड़े घोटालों के रास्ते खुलते हैं, उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ बिना किसी दबाव के जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
असल में इस फैसले से संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित भावनाओं की ही पुष्टि होती है कि कानून सबके लिए बराबर है। यह समझने की जरूरत है कि कोई भी कर्मचारी या अधिकारी, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो, यदि भ्रष्ट है, तो उसे किसी तरह की रियायत नहीं मिलनी चाहिए। यह पूरा मामला खासतौर से सीबीआई की स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है, जिसे पहले ही सर्वोच्च अदालत 'पिंजरे का तोता' बता चुकी है। यह विडंबना ही है कि देश की सर्वोच्च अभियोजन संस्था के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप लगते रहे हैं, जिससे उसकी प्रतिष्ठा कम हुई है।

हालत यह है कि सरकार ने न्यायिक निगरानी में होने वाली जांच में भी दखल देने से गुरेज नहीं किया है। वास्तव में जब तक सीबीआई को राजनीतिक दखलंदाजी से मुक्त नहीं किया जाता, यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह निष्पक्ष होकर भ्रष्टाचार या दूसरे आपराधिक मामलों की जांच कर पाएगी। मौजूदा आम चुनाव में भी भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है, मगर लाख टके का सवाल है कि क्या नई सरकार, चाहे वह जिस भी दल या गठबंधन की हो, सीबीआई को अपने नियंत्रण से मुक्त करना चाहेगी?
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