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फिर आरक्षण की जंग

Fri, 22 May 2015 08:47 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 22 May 2015 08:47 PM IST
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Again war of reservation

यह क्या सिर्फ संयोग है कि आरक्षण की पुरानी मांग के साथ गुर्जर समुदाय के लोगों ने राजस्थान में अपना आंदोलन ठीक तब शुरू किया है, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार केंद्र की सत्ता में अपना एक साल पूरा कर रही है! आंदोलनकारियों ने, पहले की ही तरह, रेल पटरियों पर कब्जा जमा लिया है, जिससे कुछ रेलगाड़ियों के रूट बदलने पड़े हैं, तो कुछ को रद्द करना पड़ा है।

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दिल्ली-मुंबई रेलमार्ग जैसे महत्वपूर्ण ट्रैक पर यातायात बाधित होने के अलावा सड़क मार्ग पर भी इस आंदोलन की आंच पहुंचने लगी है। यातायात बाधित होना आर्थिक दृष्टि से तो नुकसानदेह है ही, इससे आम जनजीवन को होने वाला नुकसान और भी अधिक होता है। चूंकि विगत में आरक्षण के इस आंदोलन को हिंसक रूप लेते देखा गया है, इसलिए भी आंदोलनकारियों के तेवर चिंतित करते हैं।
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हालांकि इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि गुर्जर समुदाय को पांच प्रतिशत आरक्षण देने के बाद राजस्थान में आरक्षण की सीमा तय 50 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी। चूंकि यह मामला अदालत में है, लिहाजा फैसला वहीं से आएगा। लेकिन यह भी सच है कि ऐसे मामलों में सरकारें समय रहते दूरदर्शिता का परिचय नहीं देतीं।
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गुर्जर आंदोलन का ही उदाहरण लें, तो इसी महीने जब आंदोलनकारियों ने न्याय यात्रा शुरू की थी, तभी सरकार को सावधान हो जाना चाहिए था। फिर मानें या न मानें, आरक्षण की मांग कई बार सामाजिक विकासहीनता और वोट बैंक की राजनीति के कारण भी उठती है।

आरक्षण की व्यवस्था आज स्थायी रूप ले चुकी है, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के बजाय जाति, वर्ग और समुदाय विशेष को इसका लाभ दिया जाता है, और कमजोर वर्ग में मलाईदार परत की उभार के बावजूद उसे इसका लाभ मिलता रहता है, तो इसके लिए यह राजनीतिक वर्ग ही जिम्मेदार है।


यही नहीं, अपने फायदे के लिए वह जब-तब आरक्षण का चारा भी फेंकता है। अलबत्ता आरक्षण की मांग करते गुर्जर समुदाय को भी थोड़ा जिम्मेदार और संवेदनशील होना चाहिए। लोकतंत्र में अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने का हक सबको है, लेकिन इसके लिए दबाव के उस तरीके का समर्थन नहीं किया जा सकता, जिसका नुकसान असंख्य लोगों को होता है।

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