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फिर नक्सली हमला
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 02 Dec 2014 08:55 PM IST
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छत्तीसगढ़ के सुकमा के चिंतागुफा क्षेत्र में नक्सलियों के हमले से यही साबित होता है कि माओवादियों का आंतरिक तंत्र सुरक्षा बलों पर भारी है। इसी क्षेत्र में माओवादी ठीक इसी तरह घात लगाकर पहले भी सुरक्षा बलों को निशाना बना चुके हैं, इसके बावजूद सुरक्षा बलों की रणनीति में बड़ा बदलाव नहीं दिखता।
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ऐसे हर हमले के बाद सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस के बीच समन्वय के अभाव की बात भी सामने आती है। हाल ही में सीआरपीएफ के महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए दिलीप त्रिवेदी ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि कुछ राज्य सरकारों में ऐसे तत्व हैं, जो अपने निहित स्वार्थों के चलते माओवाद को खत्म नहीं होने देना चाहते, क्योंकि इसके नाम पर उन्हें केंद्र से फंड मिलता है! हालांकि यह बात पूरी तरह गले नहीं उतरती, लेकिन हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद माओवादियों ने निपटा नहीं जा सका है, यह हकीकत है।
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इस हमले को इस नजरिये से भी देखने की जरूरत है कि नरेंद्र मोदी की अगुआई में एनडीए की सरकार बनने के बाद नक्सलियों का यह पहला बड़ा हमला है, जिसमें 14 जवान शहीद हो गए। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। यह हमला बताता है कि मोदी सरकार के लिए भी माओवादी हिंसा बड़ी चुनौती है।
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माओवादियों ने इस हमले को ऐसे समय अंजाम दिया है, जब छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों से पुलिस ने नक्सलियों के समर्पण के लिए अभियान चला रखा है, जिसकी वजह से तकरीबन चार सौ निचले कैडर के नक्सली हथियार डाल चुके हैं। जाहिर है, इस हमले के पीछे नक्सलियों की बौखलाहट भी हो सकती है, क्योंकि हाल ही में सीपीआई (माओवादी) के मीडिया तक पहुंचे कुछ दस्तावेजों से पता चलता है कि माओवादी भी मान रहे हैं कि हाल के वर्षों में उनकी ताकत कुछ कम हुई है।
इसके बावजूद यदि वह अपनी मर्जी से सुरक्षा बलों को निशाना बना रहे हैं, तो इससे यही पता चलता है कि उनका कैडर भले कम हो रहा हो, उनकी रणनीतिक तैयारियां सुरक्षा बलों से कहीं अधिक मजबूत हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद से लगातार माओवादियों के खिलाफ नई रणनीति और नए तरह से ऑपरेशन चलाने की बात भी हो रही है, लेकिन इसका कोई खौफ माओवादियों में नहीं दिखता।