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फिर चुनावी परीक्षा
नई दिल्ली
Updated Sun, 26 Oct 2014 08:48 PM IST
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झारखंड एवं जम्मू-कश्मीर जैसे छोटे राज्यों में पांच चरणों में मतदान की घोषणा चुनाव आयोग को नक्सलियों और आतंकवादियों की चुनौतियों को देखते हुए करनी पड़ी है, तो राजनीतिक दलों के लिए भी ये चुनाव परीक्षा से कम नहीं हैं। नेशनल कांफ्रेंस इस समय जम्मू-कश्मीर में चुनाव का विरोध कर ही रही थी, क्योंकि बाढ़ से बेहतर ढंग से न निपट पाने के कारण खराब हुई छवि से उबरने के लिए वह थोड़ा वक्त चाहती थी।
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जबकि झारखंड में झामुमो की स्थानीय पहचान को स्थिरता और विकास के भाजपा के वायदे से कड़ा मुकाबला है। महाराष्ट्र और हरियाणा की तरह इन दो राज्यों की सत्ता में भी कांग्रेस का साझा रहा है; झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार उसके समर्थन से चल रही है, तो जम्मू-कश्मीर में कुछ महीने पहले नेशनल कांफ्रेंस से उसका गठजोड़ टूटा है। लिहाजा दोनों राज्यों के चुनावी नतीजे कांग्रेस की भी किस्मत तय करेंगे।
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पर दोनों ही सूबों में भाजपा का दांव ज्यादा लगा है। राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार से मुक्ति तथा आदिवासियों का विकास झारखंड में मुख्य चुनावी मुद्दे हैं। हालांकि झारखंड की राजनीतिक अस्थिरता में भाजपा का भी कुछ कम हाथ नहीं रहा है। फिर बिहार की तर्ज पर गठजोड़ बनाकर झारखंड में भी मोदी का रथ रोकने की कोशिश होगी। इसके बावजूद भाजपा वहां मजबूत स्थिति में दिखाई देती है, तो इसकी वजह लोकसभा चुनाव में उसका शानदार प्रदर्शन है। गठबंधन राजनीति को नकारते हुए वह विकास कार्यों को तरजीह देने की जो बात कर रही है, वह भी झारखंड के लिए आकर्षित करने वाली है।
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मोदी लहर पर सवार भाजपा जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने की जो उम्मीद कर रही है, वह अलबत्ता ज्यादा देखने लायक है। बेशक पिछले विधानसभा चुनाव में ग्यारह सीटों पर जीत और इस लोकसभा चुनाव में जम्मू और लद्दाख की तीनों सीटों पर विजय से भाजपा का हौसला बढ़ा है। पर घाटी में एक भी सीट जीते बगैर उसका मिशन-44 पूरा नहीं होने वाला। बल्कि चुनाव में सत्ता-विरोधी माहौल का लाभ उस पीडीपी को मिलने की ज्यादा उम्मीद है, जिसने लोकसभा चुनाव में घाटी की तीनों सीटों पर कब्जा जमाया था। नतीजे चाहे जो भी हों, पर यह उम्मीद करनी चाहिए कि चुनाव के बाद झारखंड में एक स्थिर सरकार बनेगी और जम्मू-कश्मीर में बाढ़ प्रभावितों के राहत और पुनर्वास के साथ विकास का काम भी रफ्तार पकड़ेगा।