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तूफान के बाद

Mon, 13 Oct 2014 08:08 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 13 Oct 2014 08:08 PM IST
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After the storm

आंध्र प्रदेश और ओडिशा के तटीय इलाकों से टकराकर हुदहुद नामक तूफान कमजोर तो पड़ गया है, लेकिन असली चुनौती का सामना अब करना है। इन दोनों राज्यों में समय रहते तकरीबन पांच लाख लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाने की वजह से तूफान के कारण मरने वालों की संख्या काफी हद तक नियंत्रित हो सकी। लेकिन तूफान के कारण नौसेना के लिहाज से महत्वपूर्ण शहर विशाखापटनम में आधारभूत संरचना तकरीबन ध्वस्त हो गई है।

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डेढ़ सौ से दो सौ किमी की रफ्तार से चली तेज हवाओं और ऊंची लहरों ने दोनों राज्यों में पचास हजार से अधिक कच्चे-पक्के मकान भी ध्वस्त कर दिए। जाहिर है, अब पहली प्राथमिकता प्रभावित लोगों तक राहत पहुंचाने और संचार, बिजली और परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करने की होनी चाहिए।
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वास्तव में 1999 में ओडिशा में आए महाचक्रवात और 2004 में दक्षिणी राज्यों में आई सुनामी के बाद से देश में आपदा प्रबंधन के मामले में काफी काम हुआ है, जिसके चलते समय रहते लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचा दिया जाता है। अमूमन मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने में नाकाम रहने वाले मौसम विभाग ने पिछले कुछ वर्षों में खुद को काफी परिष्कृत किया है, जिससे नुकसान को कम करने में मदद मिली है, जैसा कि पिछले वर्ष तकरीबन इसी समय ओडिशा में आए फैलिन तूफान के समय देखा गया था।
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साथ ही इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में सेना का नेशनल डिसॉस्टर रिस्पांस फोर्स लगातार अहम भूमिका निभा रहा है। ऐसे सारे प्रयासों के बावजूद तूफान से आधारभूत संरचना और घरों तथा भवनों को होने वाले नुकसान का बचाव नहीं हो सका है।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू केंद्र से इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का आग्रह कर रहे हैं, तो वहां हुए नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता है। असल में तेलंगाना के अलग राज्य बनने के बाद अपने संसाधनों को नए सिरे से संवार रहे आंध्र प्रदेश के लिए वाकई यह मुश्किल घड़ी है।


लेकिन देखा गया कि तात्कालिक रूप से तो पीड़ितों को राहत पहुंचा दी जाती है, पर अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री जब आज विशाखापटनम में हालात का जायजा लेंगे, तो इस पर भी विचार करेंगे।

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