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दस साल बाद
नई दिल्ली
Updated Thu, 27 Mar 2014 07:28 PM IST
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संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने अपने दस वर्ष के कार्यकाल के दौरान जिन योजनाओं और नीतियों पर भरोसा किया, कांग्रेस का घोषणा पत्र उसी का विस्तार लगता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम की बाजारोन्मुखी सोच तथा सोनिया गांधी की कल्याणकारी योजनाओं ने यूपीए सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को आकार दिया था। इसके अच्छे-बुरे नतीजे सामने हैं। मगर लगता है कि कांग्रेस इसी नीति पर आगे भी चलना चाहती है, भले ही इसे अब राहुल गांधी की सोच बताया जा रहा है।
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हालांकि इस नीति के अंतर्विरोध कांग्रेस के घोषणा पत्र में भी देखे जा सकते हैं। मसलन, एक ओर तो राहुल गांधी गरीबी रेखा से ऊपर और मध्य वर्ग से नीचे के 70 करोड़ कुशल कामगारों को मध्य वर्ग में ले जाने और 10 करोड़ रोजगार पैदा करने की बात कर रहे हैं, आवास, स्वास्थ्य, पेंशन योजनाओं के विस्तार की पेशकश कर रहे हैं, मगर दूसरी ओर यह पता नहीं चलता कि इनके लिए संसाधन कहां से जुटाए जाएंगे। बेशक मनरेगा और किसानों की कर्जमाफी जैसी योजनाओं ने यूपीए को 2009 में दोबारा सत्ता दिलाई, पर इससे अस्थायी रोजगार तो पैदा हुआ, मगर इस वर्ग को कोई दूरगामी राहत नहीं मिली, जो उन्हें आर्थिक स्वावलंबन से जोड़ पाती।
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प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में पारदर्शिता लाने के लिए राष्ट्रीय वित्तीय जवाबदेही परिषद के गठन का वायदा जरूर कोयला और 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन से संबंधित घोटालों से उपजी चिंता की ओर इशारा करते हैं। एफडीआई को प्रोत्साहित करने के साथ ही जीएसटी और प्रत्यक्ष कर संहिता जैसे वायदे भी कांग्रेस ने किए हैं, मगर इसके साथ ही निजी क्षेत्रों में आरक्षण का वायदा भी है, जो कॉरपोरेट जगत को रास नहीं आने वाला।
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असल में कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल आम लोगों से संबंधित योजनाओं और बाजार तथा कॉरपोरेट जगत की जरूरतों के बीच संतुलन साधने की रही है। लेकिन स्पष्ट है कि गरीबों और कारोबारियों की जिस साझेदारी की बात कांग्रेस उपाध्यक्ष ने की है, उसे भाजपा सहित दूसरी पार्टियां भी नजरंदाज नहीं कर सकतीं। बात सिर्फ नीति की नहीं, नीयत की होती है, यूपीए सरकार की नीतियों से अधिक सवाल उसकी नीयत पर उठे हैं। राहुल के सामने इस दाग को धोने की ही सबसे बड़ी चुनौती है।