फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   after one year

एक साल बाद

Sun, 15 Jun 2014 07:48 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 15 Jun 2014 07:48 PM IST
विज्ञापन
after one year

उत्तराखंड में एक वर्ष पहले जो भीषण त्रासदी हुई थी, उसकी स्मृति से बाहर निकलने में कई दशक लगेंगे! अभी तो उस विनाश का ठीक-ठीक हिसाब ही नहीं हो पाया है, राज्य को दोबारा पटरी पर लाने की तो कल्पना करना भी बहुत दूर की बात है। इसकी वजह यह है कि एक वर्ष बाद भी राज्य में चीजें बहुत कम बदली हैं।

विज्ञापन


हादसे में बेघर हुए लोगों को अब भी न तो अपनी छत नसीब हो पाई है, न ही प्रभावित कारोबारियों के रोजगार की स्थायी व्यवस्था। बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की खतरनाक सड़कें बारिश के इस मौसम में डराती हैं, तो बह चुके झुला पुलों की जगह अस्थायी पुलों से गुजरने की विवशता अभी बनी हुई है।
विज्ञापन


कभी होटलों और ढाबों से भरा-पूरा रुद्रप्रयाग का रामबाड़ा अब अतीत की याद बन चुका है, तो गुप्तकाशी के पास देवली जैसे कई गांवों में उस त्रासदी की याद दिलाती विधवाएं बची हुई हैं! गुम हुए तीर्थयात्रियों की खोज में उनके परिजनों को एक साल बाद भी इधर-उधर भटकते हुए देखा जा सकता है। इसी बीच चार धाम यात्रा धीमी गति से चल तो रही है, लेकिन धर्मशालाओं से लेकर बाजारों तक में एक किस्म का सन्नाटा छाया है। यह सन्नाटा एक साल पहले के उस विनाश की भयावह याद का तो है ही, बरसात के इस मौसम में ठीक वैसी ही आशंका का भी है। मंदिर के कपाट खुले हैं, पर पंडे-पुजारियों के दरवाजों पर ताले लगे हैं, और तीर्थयात्रियों की मदद करने वाले घोड़े-खच्चर वालों और कुलियों की वह भीड़ नहीं दिखती।
विज्ञापन
विज्ञापन


उत्तराखंड की वह त्रासदी मानव निर्मित थी, इसमें तो कोई संदेह ही नहीं, लेकिन विडंबना यह है कि उतने व्यापक पैमाने पर हुआ विनाश भी हमारे कामकाज के ढंग, हमारी सोच और नजरिये को बदल नहीं पाया। मसलन, इस एक साल में खतरे की पूर्व चेतावनी देने का कोई तंत्र तक विकसित नहीं हो पाया। नदी किनारे और संवेदनशील जगहों पर निर्माण पर लगी फौरी रोक कब तक जारी रहेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।


अब भी केदार घाटी में नरकंकाल बरामद हो रहे हैं, तो इससे एक साल पहले चले राहत अभियान के अधूरेपन का ही पता चलता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस एक साल में भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की धार तनिक कम नहीं हुई है। ऐसे में, कोई माने तो कैसे माने कि उत्तराखंड की त्रासदी से वाकई सबक सीखे गए हैं!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed