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फांसी के बावजूद
नई दिल्ली
Updated Thu, 19 Sep 2013 08:14 PM IST
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बांग्लादेश के मुक्तियुद्ध के दौरान सामूहिक हत्याओं के दोषियों में से एक, अब्दुल कादिर मुल्ला को वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाकर न्याय को उसकी परिणति तक पहुंचा दिया है। ढाका के पास मीरपुर में मुल्ला और उसके शागिर्दों ने बांग्लाभाषी बुद्धिजीवियों की हत्या को जिस तरह अंजाम दिया था, उसके लिए फांसी से कम कोई सजा नहीं हो सकती।
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इन कट्टरवादियों के खिलाफ कार्रवाई की शुरुआत वहां दो साल पहले अंतरराष्ट्रीय युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल का गठन कर हुई थी। ट्रिब्यूनल ने इसी साल जमात-ए-इस्लामी के कई लोगों को दंडित किया था, जिसमें मुल्ला को दी गई उम्रकैद की सजा भी थी। लेकिन नई पीढ़ी इन फैसलों से खुश नहीं थी। ढाका के शाहबाग चौक पर लाखों युवाओं के आंदोलन के बाद सरकार ने ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती न देने का कानून बदला।
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नतीजतन हत्यारे भी सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचे और अभियोजन भी। उसी सिलसिले में शीर्ष अदालत ने मुल्ला की उम्रकैद को मृत्युदंड में बदला है। इस निर्णय से बांग्लादेश की न्यायपालिका की साख तो बढ़ी है; इसी साल उसने जमात को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया है, क्योंकि एक पार्टी के तौर पर उसका रजिस्ट्रेशन वैध नहीं है। पर मुल्ला की फांसी से कई सवाल पैदा हुए हैं।
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इसे दक्षिण एशिया में पहला ऐसा फैसला बताया जा रहा है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाया है। मानवाधिकारवादी इस फैसले का इसलिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इसे चुनौती नहीं दी जा सकती, सिर्फ राष्ट्रपति से क्षमा मांगना ही एकमात्र विकल्प है। आपत्ति उस ट्रिब्यूनल पर भी है, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनुमोदित नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक है। अभी शेख हसीना की सरकार है, लिहाजा मुक्तियोद्धाओं के पक्ष में माहौल है। चार महीने बाद होने वाले चुनाव में अगर खालिदा जिया सत्ता में लौटती हैं, जिसके पूरे आसार हैं, तो कट्टरपंथियों की फिर से बन आएगी। अगर तब वे यह फैसला बदलने के लिए दबाव बनाते हैं, तो अवामी पार्टी का यह अभियान बेकार हो जाएगा। लेकिन जिस देश में दो राजनीतिक पार्टियों की बुनियाद ही आपसी शत्रुता पर टिकी हो, वहां लोकतंत्र और स्वतंत्र न्यायपालिका के बावजूद ऐसी स्थिति पैदा होना अस्वाभाविक नहीं है।