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सत्रह साल बाद

Mon, 30 Sep 2013 08:09 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 30 Sep 2013 08:09 PM IST
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After 17 years

चारा घोटाले के मामले में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव तथा बिहार के एक और पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र सहित 44 लोगों को दोषी ठहराने वाला सीबीआई की विशेष अदालत का फैसला न्यायपालिका के प्रति भरोसा जगाने वाला है। वरना विभिन्न कारणों से यह धारणा मजबूत होती गई है कि राजनेताओं का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

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इस घोटाले में 1996 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसके 17 वर्ष बाद यह फैसला आया है, फिर भी इसे एक अच्छी शुरुआत कह सकते हैं। हैरानी की बात यह है कि राजनीतिक व्यवस्था को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की जिम्मेदारी संसद और सरकारों की होनी चाहिए, मगर इसके लिए न्यायपालिका को आगे आना पड़ता है। इस फैसले को सर्वोच्च अदालत के उस फैसले के आलोक में देखना चाहिए, जिसमें उसने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के उन प्रावधानों को निरस्त किया है, जिनके मुताबिक आपराधिक मामले में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा पाने के बावजूद सांसदों या विधायकों की सदस्यता बरकरार रह सकती है।
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इस फैसले को पलटने वाला यूपीए सरकार का अध्यादेश भी चूंकि राहुल गांधी के कथित साहसिक कदम के कारण लटक गया है, जिससे इस फैसले का दूरगामी असर हो सकता है। पर क्या इसे राजनीतिक पार्टियां किसी नजीर की तरह लेंगी? मुश्किल यह है कि इस फैसले को राजनीतिक नफे-नुकसान के गणित से आंका जा रहा है। लालू के पतन से नीतीश कुमार खुश होंगे, बावजूद इसके कि अदालत ने जद(यू) के एक सांसद को भी दोषी ठहराया है! भाजपा इस बहाने यूपीए पर भी निशाना साध रही है, पर गुजरात में कुछ महीने पहले ही एक मंत्री बाबू बोकारिया को अवैध खनन मामले में दोषी ठहराया जा चुका है, मगर वह पद पर कायम हैं।
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सच यह है कि आपराधिक मामलों में नाम आने के बाद राजनेता बच निकालने के रास्ते तलाशते हैं और उनके सहयोगी साथ देने से भी गुरेज नहीं करते। असल में यह एक लंबी लड़ाई है, जिसके लिए जरूरी है कि दागी लोग संसद और विधानसभाओं में न जा सकें। जयप्रकाश नारायण के 1974 के आंदोलन की मूल भावना भ्रष्टाचार विरोधी थी और उस आंदोलन की उपज लालू प्रसाद यदि आज जेल में हैं, तो किसी क्रांति की वजह से नहीं, अपनी करतूतों के कारण।

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