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गणतंत्र की उपलब्धियां
नई दिल्ली
Updated Sun, 25 Jan 2015 08:28 PM IST
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भारतीय गणतंत्र की छियासठवीं वर्षगांठ पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का मुख्य अतिथि होना सिर्फ संयोग नहीं है, यह लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रति इन दो देशों की प्रतिबद्धता का भी सुबूत है। पैंसठ साल पहले हमारे यहां आज के दिन संविधान को लागू करते हुए जिस गणतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत की गई थी, वस्तुतः वही इस देश की सबसे ठोस और स्पष्ट पहचान है।
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गणतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें असली ताकत जनता और उसके चुने हुए प्रतिनिधियों में होती है। गणतांत्रिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलने देने के लिए हमारे संविधान ने न सिर्फ वयस्क मताधिकार का प्रावधान किया, बल्कि इसने स्वतंत्रता और समानता पर भी जोर दिया। यह इसी का नतीजा है कि विगत पैंसठ वर्षों में गणतंत्र की हमारी गाड़ी बगैर किसी अवरोध के चलती रही है, और विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका अपनी भूमिकाओं का सम्यक निर्वहन करती आई हैं।
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कभी दूसरे देशों की मदद का मोहताज भारत आज खाद्यान्न का अतिरिक्त उत्पादन करता है; शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है; पोलियो समेत कई रोगों को निर्मूल किया गया है; उदार अर्थनीति को लागू करने के बावजूद कल्याणकारी भूमिकाओं से मुंह नहीं मोड़ा गया है। इस बीच हम आर्थिक रूप से तो शक्तिशाली बने ही, हमारी सामरिक शक्ति मजबूत हुई और विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी हम आगे बढ़े। सूचना का अधिकार जैसा कानून गणतंत्र को पारदर्शी बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ है, तो हाल ही में खुद प्रधानमंत्री का बेटियों को बचाने के लिए आगे आना लैंगिक समानता को बनाए रखने की याद याद दिलाता है।
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हालांकि इस दौरान जनता और जनप्रतिनिधि के बीच दूरी बढ़ी है, गरीबी उन्मूलन संभव नहीं हुआ है, सभी नागरिकों के लिए स्वच्छ पेयजल अब भी सपना है और शिक्षा के अधिकार के बावजूद गरीबी बच्चों को काम करने और कचरा बीनने को मजबूर करती है। इसी तरह मुखर होती सांप्रदायिक सोच धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर खतरा है, आतंकवाद और सामाजिक हिंसा नए रूप में सामने आ रही है, बदलता श्रम कानून मजदूरों के लिए मारक है, तो आदिवासी व दूसरे वंचित समाज की बेहतरी पर ध्यान न के बराबर है। बेहतर हो कि यह गणतंत्र दिवस इन खामियों को खत्म करने के लिए प्रण लेने का अवसर बने।