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बेखौफ तालिबान
नई दिल्ली
Updated Tue, 10 Jun 2014 08:28 PM IST
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पाकिस्तान के वाणिज्यिक शहर कराची के अति व्यस्त हवाई अड्डे पर तालिबान के हमले इसी बात की तस्दीक करते हैं कि हमारा पड़ोसी मुल्क आतंकवाद से किस तरह जूझ रहा है। हैरानी की बात है कि लगातार दो दिन तक तालिबान के आतंकी सुरक्षा घेरे को तोड़ कर अपने मंसूबों को अंजाम देने में सफल हुए हैं। इससे वहां सुरक्षा की खामियों के साथ ही लोकतांत्रिक सरकार की बेबसी भी उजागर होती है।
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कराची हवाई अड्डे पर सोमवार तड़के हुए हमले के बाद मारे गए तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान के आतंकियों के पास से जो चीजें बरामद हुईं, उससे तो लगता है कि वे वहां बड़ी साजिश के तहत आए थे और संभवतः विमान का अपहरण भी करना चाहते थे।
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दरअसल तालिबान अफगानिस्तान से सटे वजीरिस्तान के कबायली इलाके में किए जा रहे हवाई हमलों से बौखलाए हुए हैं। फेडरल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्राइबल एरिया यानी फाटा के नाम से जाना जाने वाले इस इलाके पर किसी पाकिस्तानी सरकार का पूरा नियंत्रण कभी रहा ही नहीं। अल कायदा और तालिबान ने इसे अपना गढ़ बना लिया और आज भी यहां उज्बेक और चेचेन सहित कई तरह के जेहादी शरण लिए हुए हैं। असल में नवाज शरीफ सरकार के सामने सिर्फ पाकिस्तानी तालिबान से ही नहीं, इन विदेशी जेहादी गुटों से भी निपटने की चुनौती है।
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अफगानिस्तान से इस वर्ष अमेरिकी और नाटो फौजों के जाने के बाद यह खतरा और बढ़ता जाएगा। पाकिस्तानी तालिबान अफगानिस्तान में भारतीय हितों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं, जैसा कि नवाज शरीफ की हाल की भारत यात्रा के दौरान हेरात में भारतीय वाणिज्यिक दूतावास पर हुए हमले और एक भारतीय नागरिक के अपहरण की घटना से पता चलता है।
ऐसा लगता है कि तालिबान और उसके साथ सक्रिय जेहादी गुटों में अमेरिका का भी खौफ नहीं रहा। खुद अमेरिका ने पिछले दिनों जिस तरह से अपने एक सैनिक की रिहाई के लिए तालिबान के पांच खूंखार लड़ाकों की अदला-बदला की, उससे यह संदेश गया है कि अमेरिका को इस क्षेत्र से बहुत लेना-देना नहीं रह गया है।
जाहिर है, यहां के आतंकी गुटों से निपटने के लिए भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकारों को ही मिलकर आगे आना होगा, मगर यह तभी संभव होगा जब पाकिस्तान कराची और मुंबई के आतंकी हमलों को एक नजरिये से देखे।