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सड़क पर सरकार
नई दिल्ली
Updated Mon, 20 Jan 2014 07:28 PM IST
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इससे पहले भी अतीत में कुछ मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार के खिलाफ अपने राज्यों के हितों को लेकर दिल्ली में धरने दिए हैं, मगर वह प्रतीकात्मक ही ज्यादा रहे हैं। मगर जिस तरह से अरविंद केजरीवाल दिल्ली पुलिस के कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ ही धरने पर बैठ गए, उससे अप्रिय स्थिति बन गई है।
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हालांकि आम आदमी पार्टी का जन्म जिस तरह हुआ है, उसमें केजरीवाल का धरने पर इस तरह बैठना अप्रत्याशित नहीं है। असल में, सवाल दिल्ली पुलिस की भूमिका और दिल्ली की राज्य सरकार के साथ उसके संबंधों का है और दोनों के बीच इस तरह का टकराव नया नहीं है।
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इससे पहले 16 दिसंबर, 2012 को राजधानी में पैरा मेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद किए गए प्रदर्शन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और तत्कालीन पुलिस कमीश्नर नीरज कुमार के बीच भी टकराव हुआ था; और तब भी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस के उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई से इन्कार कर दिया था, जिन्होंने कथित तौर पर पीड़िता के बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग करने के एसडीएम के आदेश की अवहेलना की थी।
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ताजा टकराव दिल्ली सरकार के दो मंत्रियों सोमनाथ भारती और राखी बिड़ला की छापेमारी से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर पुलिस ने उनके साथ सहयोग नहीं किया। जो घटनाएं सामने आई हैं, उसमें मंत्रियों के तौर-तरीकों पर सवाल जरूर हो सकते हैं, मगर ऐसे मामलों में दिल्ली ही नहीं, पूरे देश में अमूमन पुलिस का जो रवैया होता है, वह किसी से छिपा नहीं है।
उप-राज्यपाल ने इस घटना के लिए जांच बिठा दी है, लेकिन इस मसले के दूरगामी समाधान की जरूरत है। निश्चित ही आम आदमी पार्टी राजनीति के नए व्याकरण और नए मुहावरों के साथ मैदान में उतरी है और तुरंत कार्रवाई पर यकीन करती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने की एक प्रक्रिया है, जिसमें विभिन्न संस्थाओं की भूमिकाएं तय हैं, जिसका सम्मान किए जाने की जरूरत है।
आप को चाहिए कि वह इस घटना को अपने मंत्रियों के अहम का सवाल न बनाए, वरना उसकी छवि एक अराजक संगठन की बनकर रह जाएगी।