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एक जरूरी पहल
नई दिल्ली
Updated Wed, 13 Nov 2013 08:55 PM IST
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संज्ञेय अपराधों में तत्काल प्राथमिकी दर्ज करने का जो निर्देश अपराध प्रक्रिया संहिता में पहले से दर्ज है, उस पर अमल करवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ को नए सिरे से निर्देश देना पड़े, तो समझा जा सकता है कि स्थिति कितनी गंभीर है।
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यह हकीकत है कि अपहरण, बलात्कार, हत्या और डकैती जैसे मामलों में एफआईआर दर्ज करने में पुलिस वाले आनाकानी करते हैं। क्योंकि एक तो इससे उनके थाने का रिकॉर्ड खराब होता है, फिर अपराध दर्ज हो जाने के बाद उसे उसकी निर्णायक परिणति तक पहुंचाना जरूरी हो जाता है। कई बार स्थानीय दबंगों के असर के कारण भी प्राथमिकी दर्ज करने से बचा जाता है। यदि दिल्ली जैसे महानगर में एफआईआर दर्ज न करने के चौंकाने वाले आंकड़े हों, तो ग्रामीण भारत की कल्पना ही की जा सकती है।
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गाजियाबाद की एक नाबालिग लड़की के अपहरण के मामले की सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाते हुए शीर्ष अदालत ने कुछ बातें बिल्कुल साफ कर दी हैं। जैसे कि संज्ञेय अपराधों में पहले एफआईआर दर्ज करना होगा, और प्राथमिक जांच बाद में होगी। दरअसल होता यह है कि थाने में शिकायत आते ही पुलिसकर्मी पहले जांच करते हैं, फिर तय करते हैं कि इसकी प्राथमिकी लिखी जाए या नहीं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे नहीं चलेगा। हां, प्राथमिकी दर्ज करने के बाद अगर शिकायत झूठी निकलती है, तो शिकायत करने वाले के खिलाफ मुकदमा चलाया जाएगा। इसी तरह एफआईआर दर्ज करने का मतलब गिरफ्तारी नहीं है।
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फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि एफआईआर दर्ज न करने वाले के खिलाफ कार्रवाई होगी। यानी अब पुलिस अधिकारियों पर भी आनाकानी करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा। लेकिन जो स्थिति है, उसमें कितना आश्वस्त हुआ जाए कि अब ग्रामीण भारत और दूर-दराज के इलाकों में थाने अपनी पहचान और पुलिस अपना रवैया बदलेंगे ही! पुलिस बल की अपर्याप्त संख्या भी एक बड़ी चुनौती है, जिससे निपटे बिना कोई भी कदम कारगर नहीं होगा। फिर भी सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय के जरिये आम आदमी को ताकत तो दी ही है। वह इसे समझे और जागरूक बने, व्यापक अर्थ में तस्वीर तो तभी बदलेगी।