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लीक से अलग एक राजनेता
Updated Mon, 19 Nov 2012 07:34 AM IST
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बाला साहब ठाकरे का जाना भारतीय राजनीति की कदाचित सबसे करिश्माई शख्सियत का जाना है। बेशक उनके व्यक्तित्व, और राजनीति से, बहुत लोग सहमत नहीं होंगे। महाराष्ट्र जैसे प्रबुद्ध राज्य को हिंसक क्षेत्रवाद में धकेल देने, खुद कलाकार होने के बावजूद पड़ोसी देश के खिलाड़ियों और कलाकारों का विरोध करने और मेहनत से बनाई राजनीतिक पार्टी शिवसेना में उत्तराधिकारी के रूप में अपने खून को वरीयता देने जैसे उनके फैसले की आलोचना भी कम नहीं हुई।
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लेकिन इससे उस व्यक्ति का महत्व कम नहीं होता, जो करीब आधी सदी तक महाराष्ट्र की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाता रहा। मौजूदा तंत्र के भीतर ही समानांतर सत्ता चलाने वाले बाल ठाकरे का नाम कुछ लोगों के मन में भय पैदा करता था, तो समाज के एक हिस्से को उनसे अभयदान मिलता रहा। वस्तुतः लंबे राजनीतिक जीवन में अपने भीतर के कार्टूनिस्ट को उन्होंने हमेशा जीवित रखा।
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एक कार्टूनिस्ट के लिए मजाक उड़ाने या तीखी आलोचना करने के अलावा तीसरा विकल्प नहीं होता; बाल ठाकरे की पूरी राजनीति इसी के आसपास केंद्रित रही। इसीलिए गोलमोल भाषा में बोलने या राजनीतिक लाभ-हानि का हिसाब करने के बजाय हमेशा उन्होंने दोटूक और बेलाग अपनी बात कही। राष्ट्रपति पद के लिए राजग से अलग हटकर संप्रग उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन करना या भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए खुलेआम सुषमा स्वराज का नाम प्रस्तावित करना उनकी इस बेलाग शैली का हालिया सुबूत था।
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जब भारतीय राजनीति में क्षेत्रवादी और गठबंधन राजनीति की शुरुआत नहीं हुई थी, उससे बहुत पहले बाल ठाकरे महाराष्ट्र में एक बड़ी ताकत बन चुके थे, इसके बावजूद सत्ता से न जुड़ने की चाह भी उन्हें ढर्रे के राजनेताओं से अलग करती थी। हां, महाराष्ट्र में पहली बार शिवसेना-भाजपा की गठबंधन सरकार बनने के बाद आम लोगों के लिए शुरू की गई दो योजनाएं, एक रुपये में भोजन और गरीबों के लिए फ्लैट, उनकी जनहितकारी सोच के बारे में जरूर बताती थीं।
इसके बावजूद उन्हें अपनी उपलब्धियों का श्रेय नहीं मिला, तो इसके लिए कमोबेश उनकी वह राजनीति जिम्मेदार है, जिससे उनकी पहचान बनी। जिस दौर में पलक झपकते निष्ठाएं बदल जाती हैं, उस दौर में करीब पांच दशक लंबा अपना जादू बरकरार रख पाना बाला साहब ठाकरे की एक ऐसी उपलब्धि है, जिसकी बराबरी शायद ही कोई दूसरा राजनेता कर सके।