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एक सराहनीय पहल

Sun, 30 Mar 2014 06:51 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 30 Mar 2014 06:51 PM IST
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A commendable initiative

जब चुनाव प्रचार मर्यादा की सीमाएं लांघ रहा है, तब बंगलूरू के एक नागरिक संगठन बीपीएसी यानी बंगलूरू पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी ने विभिन्न दलों के प्रत्याशियों को एक मंच पर लाने की शुरुआत कर एक सराहनीय पहल की है। इस कवायद का लक्ष्य यह जानना है कि चुनाव में खड़े हुए प्रत्याशी अपने लोकसभा क्षेत्र की बेहतरी के लिए क्या करना चाहते हैं।

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जिस देश में जाति, धर्म और दूसरे समीकरणों के जरिये नेता अपने मतदाताओं को लुभाने की कोशिश में रहते हैं, वहां उनसे उनके चुनावी क्षेत्र की प्राथमिकताओं के बारे में पूछना मतदाताओं को जागरूक करने का जरिया है, जिसकी लोकतंत्र में तो जरूरत है, लेकिन इस ओर कम ही सोचा गया है।
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इस अभियान की शुरुआत बंगलूरू दक्षिण से हुई, जहां कांग्रेस के नंदन नीलेकणि, भाजपा के अनंत कुमार, जद (सेक्यूलर) की रूथ मनोरमा और आप की नीना पी नायक एक मंच पर थीं। हालांकि कार्यक्रम में नेताओं की तुलना में उनके समर्थक ज्यादा उग्र दिखे। मसलन, नंदन नीलेकणि ने अंग्रेजी में बात रखी, तो उनसे कन्नड में बोलने को कहा गया। इसी तरह, अनंत कुमार ने स्थानीय मुद्दों के बजाय राष्ट्रीय समस्याओं पर बोलना शुरू किया, तो कांग्रेस समर्थक नाराज हो गए। हंगामे के कारण कार्यक्रम को न सिर्फ स्थगित करना पड़ा, बल्कि बीपीएसी की प्रमुख किरण मजूमदार शॉ को कहना पड़ा कि हमारी राजनीतिक संस्कृति में स्वस्थ बहस की गुंजाइश नहीं है। अलबत्ता इससे इस कार्यक्रम का महत्व कम नहीं होता।
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दक्षिण बंगलूरू के जो प्रत्याशी कल तक एक दूसरे के खिलाफ जहर उगल रहे थे, उन्हें हाथ मिलाते हुए देखना एक सुखद अनुभव था। जो देश अपनी मजबूत लोकतांत्रिक परंपरा पर गर्व करता है, उसकी चुनावी राजनीति को इतना कटु क्यों होना चाहिए कि विभिन्न दलों के प्रत्याशी एक मंच साझा न कर सकें? बंगलूरू ने इस भ्रम को दूर किया है। वहां आगे इस तरह के और आयोजन होने हैं, जिनका लाभ मतदाताओं को ही होगा।


बंगलूरू का यह जन संगठन इससे पहले अपने सांसदों की रैंकिंग सार्वजनिक कर स्थानीय मुद्दों पर उनकी राय पूछ चुका है। सवाल यह है कि ऐसी पहल बंगलूरू तक ही सीमित क्यों रहे, राष्ट्रीय स्तर पर मतदाताओं को जागरूक करने की ऐसी कोशिशें क्यों न हों।

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