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आप के 49 दिन

Fri, 14 Feb 2014 09:39 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 14 Feb 2014 09:39 PM IST
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49 days of AAP

अरविंद केजरीवाल ने 28 दिसंबर को जिस दिन शपथ ली थी, उसी दिन से साफ था कि कांग्रेस के समर्थन से चल रही उनकी सरकार किसी भी दिन गिर सकती है। इसलिए जनलोकपाल के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी का जाना अप्रत्याशित नहीं है। असल में कांग्रेस और भाजपा सहित तमाम स्थापित राजनीतिक पार्टियों के बरक्स आम आदमी पार्टी का जन्म ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हुआ था।

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बेशक, केजरीवाल का यह कदम आम आदमी पार्टी की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसके जरिये वह लोकसभा चुनाव में, और जैसा कि तय दिख रहा है दिल्ली विधानसभा के एक और चुनाव में, खुद को 'शहीद' के रूप में पेश करें। लेकिन आप की सरकार ने 49 दिनों के भीतर दिल्ली की स्थापित व्यवस्था को बदलने की कोशिश जरूर की, चाहे वह लाल बत्ती और वीआईपी संस्कृति हो या पानी-बिजली जैसे मसले या फिर स्कूलों में दाखिले का मामला।
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आज भले ही कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां उनकी अनुभवहीनता पर सवाल उठा रही हैं, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि आप की सरकार ने बड़ी बिजली कंपनियों से भी टकराने का साहस दिखाया। इससे इन्कार नहीं कि आप में एक तरह का उतावलापन दिखता है, सोमनाथ भारती के मसले पर उसकी अपरिपक्वता भी दिखी, उसके विधायकों-मंत्रियों को विधायी तौर-तरीके ठीक से पता नहीं थे।
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संभवतः इसी का नतीजा है कि कांग्रेस और भाजपा के विधायकों ने मिलकर दिल्ली विधानसभा के संचालन से संबंधित उन नियमों को निरस्त करने का प्रस्ताव पारित करवा लिया, जिससे विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियां ही क्षीण हो गईं! यही नहीं, जनलोकपाल के मुद्दे पर भी कांग्रेस और भाजपा का दोहरापन उजागर हुआ है, क्योंकि एक ओर तो ये दोनों पार्टियां कहती आई हैं कि वे एक मजबूत जनलोकपाल के पक्ष में हैं, पर जब इससे संबंधित विधेयक पेश किया गया, तो वे सांविधानिक मर्यादाओं की दुहाई देने लगीं।


वस्तुतः दिल्ली विधानसभा में पेश किए जाने वाले विधेयकों के बारे में संविधान विशेषज्ञ भी एकमत नहीं हैं, और सवाल नीयत का भी है। केजरीवाल ने अपनी सरकार के इस्तीफे के जरिये वाकई एक बड़ा दांव चला है, क्योंकि अगले कुछ दिनों में जब वह लोगों के बीच जाएंगे, तब उन्हें कई असहज सवालों का भी सामना करना पड़ेगा। वह हर बार आम आदमी होने की दुहाई देकर अपनी जिम्मेदारियों, जवाबदेहियों से नहीं बच सकते।

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