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याददाश्त से जुड़ी दिक्कत है तो पढ़ें यह खबर

Wed, 12 Mar 2014 10:47 AM IST
Updated Wed, 12 Mar 2014 10:47 AM IST
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blood test for alzheimer

अमरीकी शोधकर्ताओं के मुताबिक़ ब्लड टेस्ट के ज़रिए समय रहते अल्ज़ाइमर बीमारी के बारे में जाना जा सकता है।

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उन्होंने पाया है कि ख़ून में मौजूद दस वसाओं के स्तर के बारे में जांच करके अगले तीन वर्षों के दौरान अल्ज़ाइमर के जोख़िम को 90 प्रतिशत तक सटीक ढंग से जाना जा सकता है।

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यह शोध जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं और अब इन नतीजों का बड़े स्तर पर परीक्षण किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन नतीजों की पुष्टि होनी है, लेकिन इस तरह का टेस्ट ही अपने आप में "एक क़दम आगे बढ़ना है।"

अल्ज़ाइमर एक ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज़ की याददाश्त कमज़ोर हो जाती है। यह एक लाइलाज बीमारी है।

बढ़ रहे हैं मरीज़
इस समय दुनिया भर में इस बीमारी से करीब 4।4 करोड़ लोग पीड़ित हैं और अनुमान है कि 2050 तक ये आंकड़ा तीन गुना हो जाएगा।

यह बीमारी गुपचुप तरीके से दिमाग़ पर असर दिखाती है करीब एक दशक के बाद इसके प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते हैं।

इस बीमारी को लाइलाज माना जाता है। डॉक्टरों का मानना है कि चूंकि इस बीमारी के बारे में काफी देर से पता चलता है और इसलिए दवाओं के परीक्षण सफल नहीं हो पाते हैं।
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अल्ज़ाइमर बीमारी
इसलिए प्राथमिकता के आधार पर इस बात की कोशिश की जा रही थी कि अल्ज़ाइमर को जोखिम का समय रहते पता कर लिया जाए।

वॉशिंगटन डीसी स्थित जॉर्जटाउन यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 525 लोगों के ख़ून के नमूनों का विश्लेषण किया। इन सभी लोगों की उम्र 70 साल से अधिक थी और यह अध्ययन पांच साल तक चला।
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उन्होंने इनमें से 53 ऐसे लोगों को चुना जिन्हें अल्ज़ाइमर की शिकायत थी या इसके मामूली लक्षण थे और उनकी तुलना 53 ऐसे लोगों के ख़ून के नमूनों से की गई जो मानसिक रूप से मज़बूत थे।

वसाओं में बदलाव
उन्होंने पाया कि दोनों समूहों के बीच दस लिपिड या वसाओं के स्तर में अंतर था।

इसके बाद जब शोधकर्ताओं ने दूसरे ख़ून के नमूनों को देखा, तो पाया कि इन वसाओं के आधार पर आने वाले सालों में अल्ज़ाइमर के जोखिमों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

जॉर्जटाउन यूनीवर्सिटी मेडिकल सेंटर में न्यूरोलॉजी के प्रोफ़ेसर हावर्ड फेडरॉफ़ ने बताया, "मैं मानता हूं कि ऐसे किसी परीक्षण की काफ़ी ज़रूरत है। लेकिन इलाज के लिए इसका इस्तेमाल करने से पहले कई लोगों पर इसका प्रयोग करना होगा।"


अभी ये एकदम साफ़ नहीं है कि किन वजहों से ख़ून में इन वसाओं में बदलाव आता है, लेकिन अल्ज़ाइमर का टेस्ट सफल होने से इस बीमारी के शुरुआती दौर में ही मरीज़ों का इलाज और शोध किए जा सकेंगे।

अल्ज़ाइमर रिसर्च यूके के डॉ. साइमन रिडले ने इन नतीजों को "उत्साहवर्धक" बताया और कहा कि ख़ून की जाँच आगे की दिशा में बढ़ाया गया एक क़दम है।

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