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भारतीय मुस्लिमों को IS से हमदर्दी क्यों नहीं?

Mon, 23 Mar 2015 08:57 AM IST
जुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
जुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Mon, 23 Mar 2015 08:57 AM IST
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व्हाइट हाउस ने पिछले हफ्ते इस्लामी हिंसक चरमपंथ से निपटने के लिए एक शिखर सम्मेलन की मेजबानी की जिसमें भारत का प्रतिनिधित्व सरकार की संयुक्त खुफिया समिति (जेआईसी) के अध्यक्ष आरएन रवि ने किया। ये समिति देश में हो रही संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखती है।

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आएन रवि ने सम्मेलन में कहा कि भारत में 18 करोड़ मुसलमान रहते हैं जो देश की कुल आबादी का 14.88 प्रतिशत हैं, इसके बावजूद वो वैश्विक इस्लामी चरमपंथी समूहों में शामिल नहीं हैं। जानिए क्यों?
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इंडियन मुजाहिदीन के बारे में कहा जाता है कि वो भारतीय मुसलमानों का देसी चरमपंथी ग्रुप है, लेकिन न तो इसके वजूद का कभी कोई ठोस सबूत मिला है और न ही इसका मुस्लिम समुदाय पर कोई असर है।
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अल कायदा ने इन मुसलमानों को लुभाने की अनथक कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा। इससे पहले, कश्मीर के कुछ चरमपंथ गुटों ने भारतीय मुसलमानों से उनके संघर्ष में शामिल होने की उम्मीदें कीं, लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया।

'कश्मीरी चरमपंथी मुसलमानों को भड़काते हैं'

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अब इस्लामिक स्टेट की चर्चा है, जिसमें इक्का-दुक्का भारतीय मुसलमान युवकों ने शामिल होने की कोशिश की, लेकिन उनकी कहानी वहीं खत्म हो जाती है।

इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद दुनिया में सबसे अधिक मुसलमान भारत में रहते हैं। इंडोनेशिया चरमपंथ से मुक्त नहीं है जबकि पाकिस्तान चरमपंथी गुटों का गढ़ माना जाता है। तो भारतीय मुसलमान 'ग्लोबल इस्लामिक टेररिज्म' में शामिल क्यों नहीं हैं?

26 नवंबर 2008 को मुंबई पर चरमपंथी हमलों के विरोध में एक सप्ताह बाद शहर के हजारों लोग दक्षिण मुंबई की सड़कों पर उमड़ पड़े। मुझे आज भी वो मंजर याद है जब मैंने बुर्का पोश मुस्लिम औरतों के हाथों में तख्तियां देखी थीं, जिन पर हिंदी में लिखा था 'आतंकवाद मुर्दाबाद'।

मुझे वो भी दिन याद है जब मैं 1993 में एक अखबार के लिए रिपोर्ट करने श्रीनगर गया था। सुरक्षा बलों ने एक बिहारी मुसलमान को चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के इल्जाम में गिरफ्तार किया था। मैंने अधिकारियों से पूछा, "क्या मेनलैंड इंडिया के मुसलमान कश्मीरी चरमपंथी अभियान में शामिल हैं?"

उनका कहना था 'नहीं'। उनका दावा था गरम कपड़ों और शॉल बेचने के बहाने कश्मीरी चरमपंथी देश भर में जाकर भारतीय मुसलमानों को भड़काने और अपनी मुहिम में शामिल करने का काम करते थे, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। उन्होंने बताया, 'ये युवा अकेला भारतीय मुस्लिम है जो हमारी नजर में आया है।'

भारत के मुस्लिम समुदाय के अंदर की बात ये है कि ये सभी जानते हैं कि भारतीय मुसलमान अल कायदा या इस्लामिक स्टेट से हमदर्दी नहीं रखता और चरमपंथी गतिविधियों में शामिल नहीं होता, लेकिन इसके पीछे के कारणों के बारे में सबकी राय अलग-अलग है।

क्या है लोगों की राय?

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लोकतंत्र और सेक्युलर देश: आम मुसलमान को देश के लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास है, जिसके अंतर्गत 'अनेकता में एकता' पर जोर दिया जाता है। इसके कारण भारत का मुसलमान देशभक्त है।

सूफी और भक्ति मुहिम का असर: अगर आप हजरत निजामुद्दीन दरगाह जाएं या अजमेर की दरगाह, वहां पर आपको सभी धर्मों के लोग मिल जाएंगे। सूफी और संत का इस देश में सभी सम्मान करते हैं। मुसलमान खुद को समाज से अलग-थलग महसूस नहीं करते।

हिंदू धर्म और सहनशीलता: हिंदुत्व परिवार की हिंदू विचारधारा की बात को अलग रखें तो कई मुसलमान ये मानते हैं कि असली हिंदू धर्म का पालन करने वाले लोग मुस्लिम विरोधी नहीं हैं और हिंदू समाज में ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक है। भारत के मुसलमान पर हिंदू विचारधारा और संस्कृति का असर है, जिसके कारण यहां का मुसलमान इस्लामिक चरमपंथ से दूर रहता है।

पाकिस्तान की ख़राब स्थिति: भारत का मुसलमान अपने पूर्वजों का शुक्र अदा करता है कि वो बंटवारे की गरम हवा में नहीं बहे और अपने देश में रहने का फैसला किया। आज भारत का मुसलमान पाकिस्तान में चरमपंथी सरगर्मियों, हिंसा और वहां के कट्टरवादी मुसलमानों को हिकारत से देखता है।

मज़हबी आजादी: भारत के मुसलमानों को इस बात पर इत्मीनान है कि उसे अपने मजहब पर चलने की पूरी आजादी है। देशभर में मस्जिदें रोज बन रही हैं, मदरसे रोज खुल रहे हैं और यहां तक कि आजान की आवाज हिंदू बहुल इलाकों में भी दिन में पांच बार गूंजती है।

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