फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   zee group editors plea for court monitored probe rejected

जी न्यूज: अभियुक्तों के पक्ष में दायर रिट याचिका खारिज

Tue, 26 Feb 2013 08:17 PM IST
नई दिल्ली/पीयूष पांडेय
नई दिल्ली/पीयूष पांडेय Updated Tue, 26 Feb 2013 08:17 PM IST
विज्ञापन
zee group editors plea for court monitored probe rejected

दिल्ली सरकार ने सर्वोच्च अदालत से मंगलवार को कहा कि जी न्यूज के पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर समुचित संतुष्टि के बाद दर्ज की गई है। पुलिस की ओर से पहले साक्ष्यों और आरोपों पर विचार किया गया। इसके बाद आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्णय लिया गया।

विज्ञापन


शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली सरकार ने कहा है कि सर्वोच्च अदालत में इस मामले में अभियुक्तों के पक्ष में दायर की गई रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। अपराध प्रक्रिया संहिता के तहत उनके पास वैकल्पिक उपाय थे। इसके बावजूद उनकी ओर से सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। ऐसे में उनकी याचिका खारिज करने योग्य है।
विज्ञापन


दिल्ली सरकार के अतिरिक्त सचिव (गृह) की ओर से सर्वोच्च अदालत यह हलफनामा उस याचिका के जवाब में दायर किया गया है जिसमें कैग की रिपोर्ट में हेरफेर करने, जिंदल समूह से अवैध वसूली करने और दिल्ली गैंगरेप की शिकार युवती के साथ घटना के वक्त मौजूद रहे मित्र का इंटरव्यू दिखाने के मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन


हलफनामे में कहा गया है कि इन मामलों में अभी तक जांच पूरी नहीं हुई है। जहां तक मूल अधिकार के प्रयोग का सवाल है। उसके उपयोग में भी कुछ उचित पाबंदियां हैं जो सर्वोच्च अदालत के कुछ फैसलों में स्पष्ट है। इन मामलों में अभियुक्तों के किसी भी मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं होता। अभियुक्तों के खिलाफ अपराध प्रक्रिया संहिता में निर्धारित प्रक्रिया के हिसाब से ही मामला दर्ज किया गया है। आरोप बेबुनियाद हैं, अभियुक्तों के पास इसका कोई आधार नहीं है।

हलफनामे में कहा गया है कि अपराध की संज्ञेयता पर विचार करने के बाद ही मामले दर्ज किए गए और इससे पहले समुचित संतुष्टि की गई। सचिव ने यह स्पष्ट किया है कि मामले की छानबीन से नवीन जिंदल के राजनीतिक स्ततर का कोई लेना-देना नहीं है।

अभियुक्तों को अवैध वसूली के मामले में गिरफ्तार करने के 24 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। मजिस्ट्रेट की ओर से अभियुक्तों की जमानत की मांगों को दो बार खारिज किया गया। इसके बाद उन्हें सेशन कोर्ट से जमानत मिली। अदालतों ने जांच पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया है।

सर्वोच्च अदालत में अभियुक्तों की ओर से जानबूझकर याचिका दायर की गई है। ताकि तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर बचाव किया जा सके। यह आरोप पूरी तरह निराधार है कि सार्वजनिक अवकाश के दिन मामला दर्ज किया गया क्योंकि पुलिस थाने जनता के लिए हमेशा खुले रहते हैं। यह मामले किसी बदनियती से दर्ज किए गए हैं, यह पूरी तरह से गलत है।


सचिव ने याचिका को खारिज करने की मांग सर्वोच्च अदालत से करते हुए कहा है कि अभियुक्तों की ओर से आईपीसी के प्रावधानों की गलत व्याख्या की जा रही है। उनके खिलाफ फर्जीवाड़ा करने के अलावा 228अ, 384, 420, 511, 120ब और 466, 468, 469 व 471 के तहत एफआईआर दर्ज की गई हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed