'सूर्य नमस्कार करने के बाद भी मैं मुसलमान हूँ'
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मैंने बरसों पहले लंदन में पहली बार योग सीखा था। उस योग केंद्र की मुख्य योग शिक्षक एक अँग्रेज़ महिला थीं। मैंने पहली बार सूर्य नमस्कार साल 2008 में मुंबई में समुद्र के किनारे करना शुरू किया था। मेरे योग गुरु वहीं पर रोज़ सवेरे योग किया करते थे और मुफ़्त में योग सिखाते थे। लेकिन सूर्य नमस्कार करने के बावजूद मैं आज भी मुसलमान हूँ।
मुझे पहले दिन सूर्य नमस्कार करते हुए थोड़ा अटपटा-सा लगा था। मुझे लगा था कि क्या सूर्य नमस्कार करके मैं कोई पाप तो नहीं कर रहा हूँ। आप इस पर हंसेंगे या ताज्जुब करेंगे लेकिन ऐसी सोच आना लाज़िमी था। ज़रा सोचिए कि जिसे बचपन से घर, पड़ोस और समाज में ये बताया गया हो कि योग और सूर्य नमस्कार इस्लाम के ख़िलाफ़ है और ये कि ये हिंदुओं का पूजा करने का अपना तरीक़ा है, जो हमारे तरीक़े से अलग है।
अब घबराहट नहीं
सूर्य नमस्कार करते समय मैं नज़र रखता था कि कहीं कोई जान-पहचान का मुसलमान वहाँ से गुज़र तो नहीं रहा है। अगर वो देख लेगा तो मेरे बारे में क्या सोचेगा? अपने परिवारवालों को बताने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता था लेकिन धीरे-धीरे मेरी घबराहट दूर हो गई। मेरे ग्रुप में कुछ और मुसलमान पुरुष और महिलाएँ शामिल हुए तो कुछ इत्मीनान हुआ।
आज अगर मुसलमानों को सूर्य नमस्कार पर एतराज़ है तो इसे मैं समझ सकता हूँ। ये विश्वास और आस्था का मामला है। सिर्फ़ उनसे ये कह देना कि धर्म का इससे कोई लेना-देना नहीं, काफी नहीं होगा। वो इस बात से भी डरते हैं कि कहीं स्कूलों में इसे अनिवार्य न बना दिया जाए। कुछ मुसलमानों को इस बात का भी अंदेशा है कि भारतीय समाज की सोशल इंजीनियरिंग करके धीरे-धीरे इसे एक हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश तो नहीं हो रही?
ओम की जगह अल्लाह
मैं एक योग भक्त हूँ, इसके पक्ष में ही बोलूंगा क्योंकि मुझे यक़ीन है कि अगर इसे पूरा देश लाइफ़स्टाइल की तरह अपना ले तो इसके फायदे अनेक हैं। अगर किसी को सूर्य नमस्कार से घबराहट है, जैसा कि शुरू में मुझे था, तो ओम की जगह अल्लाह कह सकता है।
सूर्य नमस्कार करने से अब तक मेरा धर्म परिवर्तन नहीं हुआ है। मेरी अपने मज़हब पर आस्था नहीं डगमगाई है। योग उसी तरह है जैसे फुटबॉल, जो इंग्लैंड में शुरू हुआ लेकिन आज पूरी दुनिया का खेल है। कौन याद रखता है कि फुटबॉल का जन्म इंग्लैंड में हुआ था। इंग्लैंड की सरकार ये कहती नहीं फिर रही कि ये उनकी विरासत है।
'प्रचार गुरु ही करें'
इसी तरह से योग की सदियों पहले भारत में हुई लेकिन आज ये पूरी दुनिया में प्रचलित है। ये भारत की देन ज़रूर है लेकिन सरकार को इसकी विरासत जताने की क्या ज़रुरत है?
भारत में श्रीश्री रवि शंकर और बाबा रामदेव जैसे योगी हैं जिनका नाम दुनिया भर में है। योग का प्रचार गुरुओं के हाथों में ही रहने दें। इससे किसी को ये डर नहीं होगा कि इसे किसी पर ज़बरदस्ती थोपा जा रहा है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)