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क्या करात की इन गलतियों को सुधार पाएंगे येचुरी?

Mon, 20 Apr 2015 10:10 PM IST
Updated Mon, 20 Apr 2015 10:10 PM IST
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yechuri will face many challenge in next time

राजनीति में अपने उच्च आदर्शों और सर्वहारा की पार्टी माने जाने वाली माकपा आज अपने सिमटते जनाधार के कारण अस्तित्व बचाने की चुनौती से जूझ रही है। एक दिन पहले पार्टी की कमान थामने वाले सेंट स्टीफेंस के पूर्व छात्र सीताराम येचुरी के सामने आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यही रहेगी कि वो पार्टी को दोबारा उसकी मुकाम तक पहुंचा सकें जहां पार्टी के शिखर पुरुष रहे कामरेड ज्योति वसु और हरकिशन सिंह सुरजीत ने इसे छोड़ा था।

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उनके पास खुद को साबित करने के लिए समय भी बहुत कम है क्योंकि पार्टी को अगले साल ही उनके नेतृत्व में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में उतरना होगा। जहां उनकी टक्कर उसी पार्टी से होने वाली है जिसने गत विधानसभा चुनावों में तो उन्हें राज्य से बेदखल किया ही था लोकसभा चुनावों में भी पार्टी को मुंह की खानी पड़ी थी।
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पश्चिम बंगाल और केरल में पार्टी को खड़ा करने की चुनौती
कभी पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में एकछत्र राज करने वाली माकपा केरल और त्रिपुरा जैसे राज्यों की सत्ता भी अपने हाथ में रखती थी। लेकिन निवर्तमान महासचिव प्रकाश करात के पार्टी की बागडोर संभालने के बाद से पार्टी लगातार पतन की गर्त में जाती गई। पहले ममता बनर्जी के हाथों पश्चिम बंगाल में मुंह की खानी पड़ी और फिर केरल में भी सरकार से हाथ धोना पड़ा।
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वर्तमान में एकमात्र राज्य त्रिपुरा में ही माकपा शासित सरकार है। ऐसे में प्रकाश करात वर्तमान महासचिव सीताराम येचुरी के सामने जिम्मेदारियों और उम्मीदों का बड़ा पहाड़ छोड़ गए हैं। कांटो के ताज के साथ सीपीएम की बागडोर संभालने वाले येचुरी के सामने बड़ी चुनौती पार्टी के सिमटते जनाधार को दोबारा वापस समेटने की है। जिससे लोगों का दोबारा विश्वास कम्यूनिस्ट विचारधारा में लौट सके।

युवाओं को पार्टी से जोड़ने की चुनौती

yechuri will face many challenge in next time

प्रकाश करात के दौर में पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी ये रही कि वो युवा वर्ग को लुभाने में पूरी तरह असफल रही जबकि पुराने नेताओं को एक एक कर दरकिनार कर दिया गया। कभी माकपा के दिग्गज रहे सोमनाथ चटर्जी और सैफुद्दीन चौधरी पार्टी से बाहर हैं तो पूर्व सांसद अनिल बसु को भी पार्टी ने बहिष्कृत कर रखा है।

पार्टी के पास ऐसे गिनेचुने ही नाम हैं जिन्हें आम आदमी ठीक से पहचानता भी हो। ऐसे में येचुरी को इन दोनों ही मोर्चों पर पार्टी को स्‍थापित करना होगा। जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे सीताराम येचुरी ने छात्र राजनीति से ही माकपा में दस्तक दी थी। लेकिन उन्हीं की पार्टी ने युवाओं को जैसे नजरअंदाज कर दिया हो।

दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश में उनके बिना किसी पार्टी का आगे बढ़ना संभव नहीं दिखता। आज जब हर पार्टी युवाओं को फोकस करके अपनी नीतियों का ऐलान कर रही है वहां उन्हें नजरअंदाज करके माकपा के लिए आगे बढ़ना आसान नहीं होगा।

सिमटते कैडर को बचाए रखने का संकट
कभी माकपा की पहचान अपने कैडर के‌ लिए भी होती थी। लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल के हाथों पटखनी खाने के बाद पार्टी की यह सबसे बड़ी संपति भी धीरे-धीरे उससे दूर होती गई। इसी कैडर के दम पर कभी पश्चिम बंगाल में लाल सलाम का नारा बुलंद था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी विपक्षी तृणमूल ने उसमें जबरदस्त सेंधमारी की।

अब हालात ये हैं कि पार्टी का अपने सबसे बड़े गढ़ पश्चिम बंगाल में तो कैडर सिमट ही गया है केरल और त्रिपुरा में भी उसे इस संकट से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में येचुरी के सामने उस कैडर को दोबारा पार्टी से जोड़ना एक टेढी खीर है। क्योंकि बिना कैडर को मजबूत करे पार्टी के लिए किसी भी चुनावों में जीत दर्ज करना आसान नहीं दिखता।

येचुरी के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी होगी कि वह पार्टी का देशभर में विस्तार करने पर भी ध्यान दें। ऐसे में जब सभी क्षेत्रीय पार्टियां अपने अपने राज्यों से निकलकर दूसरे राज्यों में दस्तक देने लगी हैं तब माकपा के दो तीन राज्यों में ही खुद को समेटे रखना उसके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

पार्टी की विकासविरोधी छवि को तोड़ने की चुनौती

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अपनी जिद के लिए जाने जाने वाले माकपा के पूर्व महासचिव प्रकाश करात की एक जिद ने ही पार्टी पार्टी को ठेस पहुंचाने की शुरूआत कर दी थी। साल 2008 में परमाणु करार पर सरकार गिराने तक के लिए अड़ने वाली माकपा को अपनी उस भूल के लिए आज तक पछतावा होता होगा।

पार्टी के एक उस कदम ने जहां देश की बागडोर संभाल रहे मनमोहन सिंह और उनकी पार्टी कांग्रेस को हीरो साबित कर दिया था वहीं माकपा देशवासियों की नजर में विकास की दुश्मन हो गई थ्‍ाी। पार्टी के उस कदम का ही असर रहा कि अगले साल हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने ज्यादा बड़े बहुमत के साथ केन्द्र में सरकार बनाई वहीं माकपा के सांसदों की संख्या आधी से भी कम रह गई।

पार्टी पर विकासविरोधी होने का लगा ठप्पा आज तक नहीं हट सका है। ऐसे में येचुरी को पार्टी को उस खौल से भी बाहर निकालकर खुद को विकासवादी होने की होड़ में शामिल करना होगा।

अन्य पार्टियों से सामंजस्य बनाने की चुनौती
कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत के दौर में माकपा, भाजपा और कांग्रेस विरोधी राजनीति की धुरी हुआ करती थी। कामरेड सुरजीत के नेतृत्व में ही मुलाय‌म सिंह यादव, शरद यादव और अन्य क्षत्रप सत्तारूढ़ सरकारों के लिए खिलाफ आवाज बुलंद किया करते थे। 2004 के चुनावों तक भी माकपा इसी भूमिका में रही, लेकिन इसके बाद धीरे धीरे आत्मुग्‍ध प्रवृत्ति ने पार्टी को गर्त में ले जाने का काम किया।

लेकिन यूपीए एक के दौर में लगातार सरकार को अस्थिर करने और धमकी देने की प्रवृत्ति ने दूसरे दलों में उसकी स्वीकार्यकता को कम कर दिया। हालांकि येचुरी की गिनती एक सरल और सुलझे हुए राजनेता के तौर पर होती है और अन्य पार्टियों के नेताओं से भी उनके मधुर संबंध हैं, ऐसे में उम्‍मीद की जा सकती है कि वो दूसरे दलों के साथ एक सामंजस्य स्‍थापित कर पार्टी को दोबारा नेतृत्वकारी भूमिका में ला सकें।

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