पीएम मोदी के लिए उम्मीदों को पूरा करने का साल
भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार के लिए दस साल का ख़ाका तैयार किया है। उनके अनुसार इसके बाद उनके कामकाज का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। लेकिन आम मतदाता उनके कार्यकाल के दौरान लगातार उनके काम की पड़ताल करते रहेंगे।
इस समय मोदी को जनता का भरोसा हासिल है और इसे बनाए रखने के लिए उन्हें आर्थिक, राजनीतिक मोर्चे पर 'अच्छे दिन' लाने के लिए नए साल में कई क़दम उठाने होंगे।
पढ़िए पूरी रिपोर्ट
आज के समय में लोगों को तत्काल और तय समय पर फ़ायदे चाहिए होते हैं, ख़ुद नरेंद्र मोदी भी यही चाहते हैं। आजकल किसी राजनेता के महत्व को एक छोटे समय अंतराल के कामकाज के आधार पर आंके जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। और यह समय अंतराल अधिकतम पांच साल होता है यानी एक आम चुनाव से दूसरे आम चुनाव के बीच का वक़्त।
इस चाहत के पीछे शायद एक बड़ा कारण यह भी है कि 2014 के चुनाव, जो एक बड़ा राजनीतिक बदलाव लेकर आए थे, उनमें 'अच्छे दिन' का वायदा किया गया था। हो सकता है कि यह नारा किसी अच्छे कॉपीराइटर के दिमाग़ की उपज हो लेकिन मोदी चाहें या न चाहें उन्हें लगातार इस बात के लिए जांचा जाता रहेगा कि वह मतदाताओं के चेहरों पर मुस्कान ला पाते हैं या नहीं।
मतदाताओं की सोच पूरी तरह अतार्किक नहीं है। 2014 का दूसरा हिस्सा पूरी तरह ऐसे व्यक्ति को समझने में दिया गया जो कि राष्ट्रपति-प्रणाली सरीखे चुनाव में जीतकर आया था।
प्रधानमंत्री की छवि
मोदी के लिए 2014 ऐसा साल था जिसमें उन्हें पहले उम्मीदवार और फिर प्रधानमंत्री के रूप में ख़ुद के बारे में समझाना पड़ा। अपवादों को छोड़ दें तो, भारतीय जनता ने अपने प्रधानमंत्री की एक छवि गढ़ ली है और उसी के अनुरूप उम्मीदें कर रहे हैं।
स्टॉक मार्केट कभी भी आम भावनाओं को सटीक ढंग से परिलक्षित नहीं करता। और कम से कम ऐसे देश में तो नहीं, जहां आर्थिक असमानताएं अक्सर बहुत ज़्यादा होती हैं। हालांकि मई 2014 के चुनाव परिणामों का जिस उल्लास और आशावाद के साथ स्वागत किया गया उसने मोदी से बड़ी उम्मीदें लगा दी हैं।
बड़ी संख्या में लोगों ने अपना पैसा इस उम्मीद में बर्बाद कर दिया है कि राजनीतिक बदलाव 'अच्छी' सुबह लेकर आएगा और 2015 वादे पूरे किए जाने से तौला जाएगा।
सीधे शब्दों में कहें तो सारा ज़ोर आर्थिक प्रबंधन पर ही रहने की उम्मीद है। मोदी ने आशाएं उल्लेखनीय रूप से बढ़ा दी हैं और उन्होंने भारत की क्षमताओं में दुनिया की रुचि फिर ज़िंदा कर दी है।
चुनौतियां
साल 2015 में उन्हें भारत की क्षमता को सच्चाई में बदलने के लिए तीन महत्वपूर्ण क़दम उठाने होंगे। पहली बात, उन्हें भारत में व्यापार करना आसान बनाने के लिए कई क़दम उठाने होंगे।
बहुत सारा निवेश भारत में आने को तैयार है लेकिन इसके लिए कुछ क़दम उठाए जाने का इंतज़ार है, जैसे वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का पूरी तरह लागू होना जिससे सारे देश में एक सा बाज़ार हो, निर्माण उद्योग की अड़चन बने भूमि अधिग्रहण जैसे 'समाजवादी' क़ानूनों को हटाया जाना और एक अनुमानयोग्य और स्थाई टैक्स ढांचा जो 2015 के बजट की सबसे प्रमुख बिन्दु हो सकता है।
दूसरी बात, मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के पाँच सालों के बर्बाद होने से खीझे लोगों की नाराज़गी दूर करने के लिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि निजी क्षेत्र अपने कहे के अनुरूप काम करे और अपना पूंजीगत ख़र्च बढ़ाए।
'मेक इन इंडिया'
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी को तब काफ़ी फ़ायदा हुआ था जब साल 2008 में टाटा मोटर्स अपने नैनो प्लांट को पश्चिम बंगाल से गुजरात ले गई थी। इस एकमात्र क़दम से विकास का 'गुजरात मॉडल' भारत के नक़्शे पर आ गया। 'मेक इन इंडिया' की कोशिश को सफल करने के लिए ऐसा ही एक बड़ा कारगर फ़ैसला चाहिए।
तीसरी बात, अक्तूबर से दिसंबर के बीच मिली चुनावी जीतों ने दिखा दिया कि वह अपनी व्यक्तिगत साख का फ़ायदा अपनी पार्टी, बीजेपी, को दिला सकते हैं। अगर यही चाल 2015 में भी क़ायम रहती है तो यह विश्वास बनेगा कि यह सरकार लंबे समय के लिए और भारत राजनीतिक गुटबाज़ी और अल्पकाल की गठबंधन राजनीति के दौर में नहीं जाएगा।
अर्थशास्त्र और राजनीति का स्तर
अर्थशास्त्र और राजनीति पूरी तरह मिले हुए हैं और मोदी को दोनों क्षेत्रों में विश्वास का स्तर बनाए रखना होगा। अंततः एक ऐसे देश में जहां अक्सर ख़ुशी बॉलीवुड फ़िल्मों और क्रिकेट से नापी जाती हो अगर भारत 2015 का क्रिकेट विश्व कप जीत जाता है तो मोटे तौर पर 'अच्छे दिन' की प्रक्रिया को शुरू करने में मदद मिलेगी। फ़रवरी का यह उल्लास आने वाले 10 महीने के लिए रंगत बना देगा।