{"_id":"341e1956-1ffe-11e2-bae0-d4ae52bc57c2","slug":"yatindra-nath-das-want-freedom-at-life","type":"story","status":"publish","title_hn":"जन्मदिन विशेष: प्राणों से ज्यादा प्यारी थी यतींद्रनाथ को आजादी","category":{"title":"India News Archives","title_hn":"इंडिया न्यूज़ आर्काइव","slug":"india-news-archives"}}
जन्मदिन विशेष: प्राणों से ज्यादा प्यारी थी यतींद्रनाथ को आजादी
इंटरनेट डेस्क/धर्मेंद्र आर्य
Updated Sat, 27 Oct 2012 02:19 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आजादी की लड़ाई में अनगिनत नाम ऐसे हैं, जो इतिहास के पन्नों में आज भी गुमनाम हैं। ऐसा ही एक नाम अमर क्रांतिकारी यतींद्रनाथ दास का भी है। यतींद्रनाथ क्रांतिकारियों के संगठन 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएश्ान' के अहम सदस्य थे और शहीद भगत सिंह के साथ अंग्रेजों के खिलाफ हर संघर्ष में शामिल रहते थे।
विज्ञापन
16 साल की उम्र में मिली 6 माह की सजा
कोलकाता के एक साधारण बंगाली परिवार में 27 अक्टूबर 1904 को जन्मे यतींद्रनाथ महज 16 साल की उम्र में ही देश की आजादी के आंदोलन में कूद गए थे। महात्मा गाधी के असहयोग आंदोलन में यतींद्रनाथ ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देते हुए यतींद्रनाथ को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 6 महीने की सजा हुई। चौरी-चौरा की हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने जब असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो यतींद्रनाथ काफी निराश हुए और दोबारा कॉलेज में दाखिल हो गए।
विज्ञापन
...और जब डर गए अंग्रेज
भारत माता के लिए कुछ करने का जज्बा लिए यतींदनाथ प्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारियों के संगठन 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएश्ान' के सदस्य बन गए। 1925 में अंग्रेजों ने यतींद्रनाथ को 'दक्षिणेश्वर बम कांड' और 'काकोरी कांड' के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया। हालांकि सबूत नहीं मिलने के कारण उनपर मुकदमा तो नहीं चल पाया, लेकिन वे नजरबन्द कर लिए गए। अपने साथ हो रहे बुरे व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल की। जब यतींद्रनाथ की हालत बिगड़ने लगी तो अंग्रेज सरकार ने डरकर 21 दिन बाद उन्हें रिहा कर दिया।
विज्ञापन
शुरू हुई क्रांतिकारी भूख हड़ताल
लाहौर षडयंत्र केस में यतींद्र नाथ को भगतसिंह और अन्य क्रांतिकारियों के साथ पकड़ लिया गया। जेल में क्रांतिकारियों के साथ अच्छा बर्ताव ना होने के कारण भगतसिंह ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। भगतसिंह ने यतींद्रनाथ से भी भूख हड़ताल में शामिल होने का अनुरोध किया। यतींद्रनाथ ने इस शर्त पर भूख हड़ताल शुरू की, कि जब तक अंग्रेज उनकी मांगें नहीं मानेंगे तब तक वे अन्न नहीं खाएंगे। यतींद्रनाथ का यह प्रण सुनकर क्रांतिकारी सोच में पड़ गए, क्योंकि वे जानते थे कि यतींद्रनाथ अपने प्रण के पक्के हैं। इस अटल प्रण के साथ यतींद्रनाथ की क्रांतिकारी भूख हड़ताल शुरू हुई।
63वें दिन त्याग दिए प्राण
यतींद्रनाथ के साथ क्रांतिकारियों का हौंसला बढ़ गया और दूसरे क्रांतिकारी कैदी भी भूख हड़ताल में शामिल हो गए। अंग्रेजों ने उनकी भूख हड़ताल तुड़वाने का काफी कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। यतींद्रनाथ की हालत बिगड़ने पर भगतसिंह और अन्य क्रांतिकारियों ने भी उनसे भूख हड़ताल खत्म करने को कहा, लेकिन यतींद्रनाथ अपने प्रण से पीछे नहीं हटे और भूख हड़ताल के 63वें दिन 13 सितंबर 1929 को उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। यतींद्रनाथ ने दिखा दिया कि देश की आजादी उन्हें अपने प्राणों से भी ज्यादा प्यारी थी।