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मेमन की फांसी पर विवाद के लिए मीडिया जिम्मेदार?

Fri, 31 Jul 2015 02:49 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 31 Jul 2015 02:49 PM IST
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Yakub Memon executon and media

1993 में हुए मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फांसी से पहले बहुत विवाद हुआ। 29 अप्रैल 2015 को विशेष टाडा कोर्ट के जज जी सानप ने याकूब की फांसी की तारीख 30 जुलाई मुकर्रर करते हुए डेथ वारंट जारी किया। उसके बाद याचिकाओं का सिलसिला शुरु हो गया।

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दो महीनों के अंतराल में याकूब मेमन के वकीलों ने डेथ वारंट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पेटिशन दाखिल की। क्यूरेटिव पेटिशन खारिज होने के बाद महाराष्ट्र के राज्यपाल के पास दया याचिका लगाई गई। साथ ही याकूब ने डेथ वारंट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की। फांसी की तारीख से दो दिन पहले राष्ट्रपति के पास नए सिरे से दया याचिका भेजी गई।
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हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मेमन की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। राष्ट्रपति ने भी गृह मंत्रालय से मशविरे के बाद मेमन की दया याचिका ठुकरा दी। उसके बाद वकीलों के एक समूह ने फांसी पर स्टे लगाने के लिए याकूब की फांसी से महज पांच घंटे पहले सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अभूतपूर्व ढंग से आधी रात को फांसी से चंद घंटों पहले तक सुप्रीम कोर्ट में फांसी की वैधता पर बहस हुई। अततः वह प्रयास भी विफल रहा है।
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मीडिया की भूमिका
याकूब मेमन को गुरुवार को सुबह सात बजे फांसी पर लटका दिया गया। सवाल उठा कि फांसी के चंद घंटों पहले मेमन को बचाने की जद्दोजहद या न्यायपालिका की प्रकियाओं का कठघरे में खड़ा करने की जो कोशिश हुई, वह क्यों हुई? क्या ये विवाद मीडिया ने खड़ा किया?

जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता और वकील सुदीप श्रीवास्तव का कहना है कि याकूब मेमन के मुकदमे को राष्ट्रीय मीडिया ने जितना समय और स्थान पिछले कुछ दिनों में दिया, उतना समय और स्थान पहले दिया गया होता तो फैसला कुछ और हो सकता था।

सुदीप का मानना है कि मीडिया मुकदमों को भी 'इवेंट' मानती है। मुकदमे के कवरेज का तरीका कमजोर होता है। जैसे किसी इवेंट का फाइनल कवर किया जाता है, वैसे ही मुकदमे के फाइनल का इंतजार होता रहता है। मीडिया मुकदमे के अंतिम चरण मे ही सक्रिय होती है।

सुदीप का कहना है कि याकूब मेमन को टाडा अदालत ने 2007 में ही फांसी की सजा सुना दी थी, लेकिन मीडिया ने तब न उस मामले के तथ्यों की पड़ताल की और न ही सुनवाई की प्रक्रिया को परखा गया।

उनका कहना है कि वर्ष 2013 में जब इस मामले में शेष लोगों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया और याकूब मेमन की सजा को बरकरार रखा गया तब भी मीडिया ने एक दिन शीर्षक लगाने के बाद इस ओर ध्यान नहीं दिया। वे कहते हैं, "यदि मीडिया ने उस वक्त भी मामले का अध्ययन करके तथ्यों के साथ मामले को उठाती तो थोड़ी बात बन सकती थी लेकिन आखिर में क्यूरेटिव पीटिशन के बाद कुछ होने की गुंजाइश कम होती है। इसकी एक वजह यह है कि अदालतें आमतौर पर किसी बड़े मामले में पहले दिए गए फैसले को बदलने के पक्ष में नहीं दिखतीं, इसके पीछे शायद उनका यह डर है कि कहीं यह एक परिपाटी न बन जाए।"

सुदीप श्रीवास्तव का कहना है कि याकूब मेमन का मामला अकेला मामला नहीं है जहां मीडिया की भूमिका पर सवाल उठना चाहिए। मीडिया की ओर से यही गलती अयोध्या के मामले में हो रही है। अभी उसकी नजरों से यह मामला ओझल है लेकिन जिस दिन अंतिम फैसला आ जाएगा उस दिन मीडिया की सक्रियता देखने लायक होगी। लेकिन हो सकता है कि तब तक किसी एक पक्ष को यह महसूस हो रहा हो कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ। इसलिए मीडिया को चाहिए कि वह हर मामले पर अदालत के सामानांतर काम करता रहे और जो सवाल उठाने हैं वह साथ साथ उठते रहें।


उनका कहना है कि बस्तर में नक्सली हमले में कांग्रेस नेताओं की मौत के मामले की सुनवाई न्यायिक आयोग कर रहा है, उस पर अभी किसी राष्ट्रीय मीडिया की नजर तक नहीं है। हो सकता है कि जिस दिन फैसला आए उस दिन बहुत से सवाल लेकर मीडिया फिर आंदोलित दिखे।

सुदीप का मानना है कि मीडिया को अपनी भूमिका पर फिर से विचार करने की जरूरत है क्योंकि उनकी भूमिका राजनीति से अलग होनी चाहिए।

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