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जानें, आतंकियों से कैसे निपटते हैं दुनिया के खतरनाक कमांडो?

Tue, 05 Jan 2016 10:26 PM IST
Updated Tue, 05 Jan 2016 10:26 PM IST
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पठानकोट में हुए हमले के बाद आतंकियों के साथ चल रही मुठभेड़ को 72 घंटे से ज्यादा लंबा खिंचने के बाद सरकार के साथ ही सुरक्षाबलों की रणनीति पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। उंगलियां पंजाब पुलिस के साथ ही देश का सबसे मजबूत सुरक्षा दस्ता कहे जाने वाले नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG) पर भी उठी हैं।

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जबकि हमारे सात जवान इस हमले में शहीद हो चुके हैं, जिनमें से एक एनएसजी का भी है। पूर्व में एनएसजी इस तरह की आतंकी वारदातों का कुशलता से मुकाबला कर चुकी है लेकिन इस बार उसकी चूक कई सवाल खड़े कर रही है। 1984 में आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान एनएसजी का गठन इसी उद्देश्य से किया गया था जिसमें वह तेजी से कार्रवाई कर आतंकियों के मंसूबों को नाकामयाब कर सके।
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2002 में अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर और 2008 में हुई मुंबई हमले में एनएसजी के कमांडों ने ही आतंकियों से लोहा लिया था। पठानकोट हमले के लंबा खिंचने की वजह से अन्य सुरक्षा एजेंसियों के साथ ही एनएसजी की रणनीति भी सवालों के घेरे में है। आइए जानते हैं दुनिया की अन्य प्रमुख एजेंसियों के बारे में जो अपने दुश्मनों को पलक झपकते ही नेस्तनाबूद करने की ताकत रखती हैं।

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दुश्मनों का ढूंढकर मारने के लिए कुख्यात है मोसाद

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दुनिया की सबसे खुफिया एजेंसियों की बात की जाए तो मोसाद का नाम सबसे ऊपर आता है। इस्रायल की खुफिया एजेंसी मोसाद अपने दुश्मनों को दुनिया के कोने कोने से ढूंढकर मारने के लिए कुख्यात है। मोसाद ने ऐसे ऐसे आपरेशनों को अंजाम दिया है जिनके बारे में सुनकर ही लोग सिहर उठते हैं।

मोसाद यानी इंस्टीट्यूट फॉर इंटेलीजेंस एंड स्पेशल ऑपरेशन इजरायल की स्‍थापना प्रथम प्रधानमंत्री डेविड बुन गुरियन के कार्यकाल में 13 दिसंबर 1949 को 'सेंट्रल इंस्टीट्यूशन फॉर को-ऑर्डिनेशन' के तौर पर हुई थी। शुरूआत में राजनीति हत्याओं के तौर पर बदनाम हुई यह एजेंसी अपने दुश्मन को किसी हाल में जिंदा नहीं छोड़ती।

इसका सबसे बेहतर उदाहरण है 1972 का म्यूनिख ओलंपिक। जहां ओलंपिक खेलों के दौरान फलस्तीन के आतंकी संगठन ब्लैक सेप्टेंबर ने इस्रायल के कुछ खिलाड़ियों को बंधक बनाकर उनकी हत्या कर दी थी। मोसाद ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और उस हमले में शामिल रहे एक एक आतंकी को चुन चुन कर मारा था।


मोसाद का यह अभियान 20 साल तक चला और इसके लिए उसने दूसरे देशों में घुसकर कार्रवाई करने से भी हिचक नहीं की। 1999 में एयर इंडिया के अपहृत विमान को छुड़ाने के लिए बेशक भारत को तीन खुंखार आतंकियों को छोड़ना पड़ा हो लेकिन इस्रायल ने ऐसे ही एक मामले में कोई रियायत नहीं बरती थी।

इस्रायल के एक विमान को अपहृत करके जब युंगाडा ले जाया गया तो मोसाद ने बिना किसी देरी के युंगाडा के तानाशाह इदी अमीन की नाक के नीचे ही सभी आतंकियों को मौत के घाट उतारकर अपने विमान और यात्रियों को सुरक्षित बचा लिया था। यह दुनिया की अकेली एजेंसी है जो खुफिया और सुरक्षा दोनों का काम करती है। वर्तमान में इसके मात्र 1200 ही सदस्य हैं।

पाक में घुसकर ओसामा को मारा था अमेरिका की नेवी सील ने

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मोसाद के बाद अगर सबसे खतरनाक सुरक्षा एजेंसी की बात की जाए तो फिर जेहन में दूसरा नाम अमेरिका की नेवी सील का ही आता है। एक समय अमेरिका के सबसे कट्टर दुश्मन रहे और 9/11 हमले के मास्टरमाइंड रहे ओसामा बिन लादेन को जिस तरह पाकिस्तान में घुसकर मौत के घाट उतारा गया उसने अमेरिका की नेवी सील को दुनियाभर में प्रसिद्धी दिलाई।

नेवी सील का वह आपरेशन इस लिए भी खास रहा क्योंकि हमले में उसे कोई हानि नहीं पहुंची थी और घटना के बाद ओसामा के शव को लेकर अमेरिका की नेवी के ये योद्धा सकुशल वापस लौट आए थे। अत्याधुनिक हथियारों से लैस नेवी सील के कमांडो पल भर में ही किसी भी बड़ी से बड़ी आतंकी वारदात को निपटाने की कुव्वत रखते हैं।

अमेरिका की यूएस स्पेशल ऑपरेशंस कमांड के अतंर्गत आने वाली नेवी सील को हर मौसम और विषम से विषम परिस्थितियों में भी अपने आपरेशन को अंजाम देने की ट्रेनिंग दी गई है। वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के निर्देश पर 1962 में नेवी सील की स्‍थापना की गई थी। उस समय गुरिल्ला युद्ध से मुकाबले के लिए इसे स्‍थापित किया गया था।

पानी, धरती और आसमान में समान अधिकार से लड़ने वाली नेवी सील ने दुनियाभर में कई खतरनाक आपरेशनों को अंजाम दिया था। नेवी सील के एक्टिव सदस्यों की संख्या वर्तमान में 2500 के करीब है।

बिना नुकसान के खतरनाक मिशन पूरे किए फ्रांस की जीआईपीएन ने

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पिछले साल फ्रांस के पेरिस में व्यंग पत्रिका शार्ली एब्दो पर हमले के बाद फ्रांस की शीर्ष सुरक्षा एजेंसी जीआईपीएन ने ही आतंकियों के खिलाफ मोर्चा संभाला था। जीआईपीएन ने पूरे आपरेशन को इतनी काबिलियत से अंजाम दिया कि सभी आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया गया और उसके एक भी जवान को खरोंच तक नहीं आई।

देश में आतंकी घटनाओं के खिलाफ मोर्चा संभालने वाली जीआईपीएन के बारे में कहा जाता है कि आज तक किसी भी आपरेशन में उसने अपने एक भी जवान को नहीं खोया है। म्यूनिख में इस्रायइली खिलाड़ियों पर हमले के बाद फ्रांस में भी एक आतंकनिरोधी दस्ते की जरूरत महसूस की गई।

जिसके बाद 27 अक्टूबर को जीआईपीएन की स्‍थापना की गई। जीआईपीएन असल में फ्रांस पुलिस का ही एक दस्ता है जिसे आतंकी वारदातों से निपटने के‌ लिए विशेष तौर पर प्रशिक्षित किया गया है। शुरूआत में 30 कमांडों के साथ शुरू किया गया यह संगठन अब कई ग्रुप में काम करता है।

इसके काम करने का तरीका इतना सटीक है कि शार्ली एब्दो पत्रिका के बाद जब दोबारा पेरिस में हमला हुआ और आतंकियों ने एक जनरल स्टोर में दर्जनों लोगों को बंधक बना लिया तो जीआईपीएन के कमांडों ने बिना किसी नुकसान के सभी बंधकों को मुक्त करा लिया। इस दौरान किसी नागरिक को खरोच तक नहीं आ सकी जबकि बंधक बनाने वाले आतंकी को भी मार गिराया गया।

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