हिंदुओं के 'महाकुंभ' से क्यों कन्नी काट रहे हैं मोदी?
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दिल्ली में आयोजित विश्व हिंदू कांग्रेस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिरकत नहीं करेंगे। यह सम्मेलन 21 नवंबर से शुरु हो रहा है। सम्मेलन में 54 देशों के दो हजार प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के कई दिग्गज चेहरे सम्मेलन को संबोधित करेंगे।
आयोजन को दुनिया भर के हिंदुओं को जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। विश्व हिंदू कांग्रेस के लिए चार साल से तैयारी की जा रही है। आयोजकों का दावा है विश्व भर में फैले एक अरब हिंदुओं को एकजुट करने का ये पहला प्रयास है। प्रधानमंत्री मोदी फिर भी आयोजन से दूर रहेंगे। ऐसा क्यों?
आयोजनकर्ताओं ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू-कश्मीर और झारखंड विधानसभा चुनाव में अपनी व्यस्तता के कारण विश्व हिंदू कांग्रेस में शिरकत नहीं कर सकेंगे। लेकिन क्या चुनाव की व्यस्तता भर को प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति का कारण माना जा सकता है?
उल्लेखनीय है कि सम्मेलन तीन दिन तक चलेगा और एक दिन में आठ-आठ रैलियां कर चुके मोदी के लिए तनिक भी मुश्किल नहीं हैं कि वे सम्मेलन में शामिल न हो सकें!
प्रधानमंत्री गढ़ रहे 'नरम हिंदू' की छवि
माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में जीत के बाद से ही प्रधानमंत्री 'नरम हिंदू' की छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह छवि बिल्कुल वैसी ही जैसी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गढ़ी थी।
गुजरात दंगों समेत विहिप और बजरंग दल जैसे संगठनों की कट्टर हिंदूवादी राजनीति के साथ समझौता करने के बाद भी उन्होंने अपनी छवि 'नरम हिंदू' की ही रखी। वाजपेयी की छवि के कारण ही भाजपा 1996 और 1998 में सहयोगी दलों को ढूंढ़ पाई।
बाद में वाजपेयी की छवि ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का केंद्रबिंदु बनी। राजग ने उस छवि के इर्दगिर्द ही अपनी चुनावी रणनीति तैयार की। हालांकि 2004 के लोकसभा चुनावों में उसे इसका फायदा नहीं मिल पाया।
मोदी की बयानों की भाषा भी बदली
प्रधानमंत्री बनने के बाद सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारतीय मुसलमान भारत के लिए ही जिएंगे और भारत के लिए ही मरेंगे। उन्होंने कहा था कि भारतीय मुसलमानों की राष्ट्रभक्ति पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
मोदी के बयान को मुस्लिमों के प्रति उनकी बदलती धारणा के रूप में देखा गया था। मोदी ने ये बयान उस सवाल के जवाब में दिया था, जिसमें उनसे पूछा गया था कि अलकायदा भारतीय मुसलमानों पर प्रभाव डाल पाएगा या नहीं?
लोकसभा चुनाव से पहले पिछले वर्ष रायटर को दिए एक इंटरव्यू में गुजरात दंगों को लेकर पूछे एक सवाल के जवाब में मोदी ने कहा था कि कुत्ते का पिल्ला अपकी कार के नीचे आकर मर जाए तो भी दुख होता है।
मोदी के नारे की दुनिया भर में तारीफ
मोदी ने उस इंटरव्यू में कहा था कि 2002 के दंगों में उन्होंने कुछ भी किया हो तो उन्हें बीच चौराहे पर फांसी दे दी जाए। हालांकि उन्होंने मुस्लिमों के लिए तथाकथित 'कुत्ते का पिल्ला' रूपक इस्तेमाल किया था, जिसकी तीखी आलोचना हुई थी।
लोकसभा चुनावों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेक्यूलर छवि गढ़ने के लिए कई प्रयास किए। मोदी ने दुनिया भर में प्रचार किया कि उनकी सरकार का एजेंडा है-सबका साथ, सबका विकास। मोदी के नारे की दुनिया भर में तारीफ हुई।
अमेरिकी विदेशी मंत्री जॉन कैरी ने अपनी भारत यात्रा के दौरान मोदी के नारे की विशेष तारीफ की थी।
भाजपा का नया नारा है- साथ आएं, देश बनाएं
लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने भी हिंदुत्ववादी मुद्दों पर अपना रुख नरम किया। अपना जनाधार बढ़ने के लिए देश भर में सदस्यता अभियान चला रही भाजपा का नया नारा है- साथ आएं, देश बनाएं।
जम्मू-कश्मीर में पहली बार सरकार बनाने की कोशिश में लगी भाजपा ने अनुच्छेद 370 को भी हाशिए पर डाल दिया है, जबकि यह मुद्दा पार्टी के कोर एजेंडे में शामिल रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकार्य नेता बनाने का प्रयास कर रहे हैं और भाजपा खुद को अखिल भारतीय स्तर की पार्टी।
ऐसे में किसी समुदाय विशेष के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी का ना जाना आश्चर्य में नहीं डालता। वह हिंदुओं का कार्यक्रम ही क्यों न हो जिसका नारा भी है एक साथ चलें, एक साथ बोलें।