पढ़िए, चाय पैदा करने वाले श्रमिकों की दर्द भरी दास्तां
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भारत में दार्जिलिंग चाय की कई मशहूर किस्में होती हैं। लेकिन हिमालय के दक्षिण में जहां घरेलू बाजार के लिए चाय उगाई जाती है, वहां अक्सर चाय बागान श्रमिक बेहद विकट स्थितियों में रहते हैं। चाय बागान के मजदूरों की विकट स्थितियां ही हैं जिसकी वजह से कभी-कभी प्रबंधन और मजदूरों के बीच हिंसा भी होती है।
कहीं-कहीं तो इन मजदूरों को महीनों-महीनों वेतन नहीं मिलता और न ही राशन दिया जाता है। हिमालय की तहलटी पर उत्तरी बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में बसे विशाल सोनाली चाय बागान में डरावना सन्नाटा है। इसके मालिक का बंगला खाली है और कहीं भी कोई मज़दूर नजर नहीं आ रहा।
पिछले हफ्ते ही चाय बागान के मालिक राजेश झुनझुनवाला को उनकी दो मंजिला पुती हुई इमारत से निकालकर गुस्साए कर्मचारियों ने चाय की झाड़ियों के बीच पीट-पीटकर मार डाला था।
संघर्ष की जड़ आर्थिक है
पहाड़ों में उगाई जाने वाली दुनियाभर में मशहूर दार्जिलिंग चाय के विपरीत यहां घरेलू बाज़ार के लिए सस्ती चाय उगाई जाती है। दास कहते हैं, "चाय उगाने वाले दूसरे देश भी उभर आए हैं, इसलिए हमारा निर्यात घट रहा है। फायदा बहुत कम है क्योंकि उत्पादन लागत बढ़ गई है। कुछ बागान बंद हो गए हैं और कई मालिक कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं।"
बांदापानी चाय बागान के भारी लोहे के दरवाजे जुड़े हुए हैं। यह बागान 2012 में बंद हो गया था। यह इलाके के उन पांच बागानों में से है जिन्होंने काम करना बंद कर दिया है।
कारखाने की इमारत खाली है और कंपनी में कुछ आवारा पशुओं के साथ मशीनों को जंग खाते देखा जा सकता है। कभी इस बागान में हजार से ज्यादा लोग काम करते थे। अब वे सभी बेरोजगार हैं।
चाय बागान कर्मियों की कॉलोनी के छोटे मकान थोड़े ही दूर पर हैं। अंग्रेजों ने चाय बागान के साथ नई पक्की लाइन करीब 150 साल पहले बनाई थी।
घाटे से सदमें में किसान
घाटे के कारण कई बागान बंद हो गए हैं। इस हत्या से चाय बागान मालिकों में सदमे की लहर दौड़ गई है। तराई प्लांटर्स एसोसिएशन के सचिव यूबी दास कहते हैं, "यह हमला बिल्कुल अप्रत्याशित था। हम सभी हताश हैं और हर कोई अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है।"
फाटक के बाहर बने मजदूरों के घर भी सूने पड़े हैं। कुछ महिलाएं बाहर एकत्र हो गई हैं। माहौल में तनाव है। एक महिला कहती है, "रात को पुलिस आई और कई आदमियों को पकड़कर ले गई। हम लोग जंगल में भाग गए और बच्चों के साथ रात वहीं बिताई।"
अन्य ने शिकायत की कि उन्हें कई महीनों से वेतन नहीं मिला है, "हमें कुछ नहीं मिलता है, न राशन और न ही स्वास्थ्य सहायता। हम जिंदा कैसे रहेंगे?"
निराशा और कुपोषण से खराब हैं हालात
अब वहां की हवा में निराशा है। कुछ घरों की टीन की छत टूट गई है और बाकियों में खिड़कियां या दरवाजे नहीं हैं। वहां बमुश्किल ही कोई आदमी दिखता है। राधिका थापा कहती हैं, "सब काम की तलाश में गए हैं। सिर्फ जो बीमार हैं वही यहां रह गए हैं।"
सुमारी ओरांव अपने घर के बाहर बैठकर अनाज फटकार रही हैं। आज खाने में यही बनेगा। साठ के दशक की सुमारी कहीं ज्यादा बूढ़ी लगती हैं। उनके बाल पूरी तरह सफेद हो गए हैं और चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ है।
वह कहती हैं, "जबसे चाय बागान बंद हुआ तबसे बहुत मुश्किल से समय बीत रहा है। हमारे पास पर्याप्त खाना नहीं है। क्या हम कभी भरपेट खा पाएंगे?" पिछले कई सालों में कई चाय श्रमिकों की मौत हो गई है। यह बहस जारी है कि वे कुपोषण से मरे हैं या किसी और कारण से।
एक स्थानीय समाजसेवी विक्टर दास कहते हैं कि श्रमिकों के मरने की कई वजहें हैं। "अगर उन्हें वेतन नहीं मिलेगा तो उनके पास खाना खरीदने के लिए पैसा नहीं होगा, जिसकी वजह से वे कुपोषित हैं। इस कारण वे बीमार पड़ जाते हैं और अक्सर मर जाते हैं।"
19वीं सदी में अंग्रजों के बसाये इन बागानों ने चाय उत्पादकों की पूरी पीढ़ी को पाला-पोसा है। लेकिन अब सब बदल गया है। उनमें से कई बेहद गरीबी में जी रहे हैं।