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चुनाव मैदान में असुर ने भी ठोंकी ताल

Wed, 12 Nov 2014 03:24 PM IST
Updated Wed, 12 Nov 2014 03:24 PM IST
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With 10,000 cash one assur is ready to fight election

मौजूदा राजनीति में कोई उम्मीदवार दस, बीस या पचास हजार खर्च कर चुनाव लड़ना चाहे, तो सामने वाला दो टूक कह सकता है कि आप कहीं नहीं टिकेंगे।

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लेकिन इन सब की परवाह किए बिना झारखंड के सुदूर जंगल-पहाड़ में रहने वाले आदिम जनजाति के नौजवान विमल असुर बिंदास होकर चुनावी मैदान में उतरे हैं।

विमल का दावा है कि आदिम जनजाति से वे पहले युवक हैं, जो चुनाव लड़ रहे हैं, फिलहाल उनके पास सालों से जमा किए दस हजार रुपए हैं।

वह इसे चुनाव प्रचार में खर्च करेंगे। उन्हें उम्मीद है कि आदिम जनजाति समुदाय के लोग और उनके पिता से उन्हें कुछ मदद मिलेगी और फिर भी पैसे कम पड़े तो वह अपनी जमीन भी गिरवी रखने की सोचेंगे।
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विमल कहते हैं कि वह चुनाव प्रचार करने के लिए पैदल ही जंगल-पहाड़ों में आदिवासियों के पास जाएंगे। कलेबा (दिन का खाना) होगा चूड़ा और गुड़। जिनके यहां शाम गुजारेंगे वहीं बियारी (रात का खाना) का इंतजाम कर लेंगे।

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आदिम जनजातियों के बीच हो रही है चुनाव की चर्चा

With 10,000 cash one assur is ready to fight election

वह बताते हैं कि आदिम जनजातियों के बीच इसकी चर्चा होने लगी है कि विमल चुनाव लड़ने वाले हैं।

सोमरा असुर कहते हैं, "विमल समाज का अगुवा बनेगा, हम सब खुश हैं।" झारखंड में विधानसभा की 81 में से 28 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित हैं। इन्हीं में शामिल है गुमला जिले का विशुनपुर विधानसभा क्षेत्र, जहां से विमल असुर चुनाव लड़ रहे हैं।

यहां 25 नवंबर को चुनाव होंगे। उनका गांव विशुनपुर इलाक़े के सुदूर पहाड़ पोलपोल पाट में है, जो जिला मुख्यालय से करीब सौ किलोमीटर दूर है।

विमल को झारखंड विकास मोर्चा ने अपना उम्मीदवार बनाया है। विशुनपुर में कुल 13 उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं।

राज्य में हैं ऐसी आठ आदिम जनजातियां

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झारखंड में आठ आदिम जनजातियां हैं। इनमें असुर परिवार लोहरदगा, गुमला और सिमडेगा के पहाड़ों-जंगलों में बसते हैं।

असुरों के पुरखे लोहे गलाकर पंरपरागत औजार बनाने का काम करते रहे हैं। लेकिन अब लोग इस पेशे से विमुख हो रहे हैं।

जनजातीय शोध संस्थान रांची के विशेषज्ञ अखिलेश्वर सिंह बताते हैं कि 2001 की जनगणना के मुताबिक पूरे राज्य में असुरों की आबादी 10 हजार 347 थीं, जबकि आदिम जनजातियों में साक्षरता दर महज 15.5 फीसदी है।

वे बताते हैं कि आदिम जनजातियों में असुर अति पिछड़ी श्रेणी में आते हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था न्यूनतम स्तर पर है।

विमल कहते हैं कि दुनिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है, लेकिन उनके समुदाय के लोग अपने वजूद की हिफाजत के लिए संघर्ष ही कर रहे हैं।

उनके अनुसार, "आदिम जनजाति विकास के साथ कदमताल नहीं कर सके हैं। यही वजह है कि हमारा वजूद संग्राहलयों में सिमट कर रह गया है। हम शोध के विषय भर बने हैं।"

झारखंड में आठ आदिम जनजातियां हैं इनमें असुर परिवार लोहरदगा, गुमला और सिमडेगा के पहाड़ों-जंगलों में बसते हैं। असुरों के पुरखे लोहे गलाकर पंरपरागत औजार बनाने का काम करते रहे हैं, लेकिन अब लोग इस पेशे से विमुख हो रहे हैं।

जनजातीय शोध संस्थान रांची के विशेषज्ञ अखिलेश्वर सिंह बताते हैं कि 2001 की जनगणना के मुताबिक पूरे राज्य में असुरों की आबादी 10 हज़ार 347 थीं जबकि आदिम जनजातियों में साक्षरता दर महज 15.5 फीसदी है।

वे बताते हैं कि आदिम जनजातियों में असुर अति पिछड़ी श्रेणी में आते हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था न्यूनतम स्तर पर है।

विमल कहते हैं कि दुनिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है, लेकिन उनके समुदाय के लोग अपने वजूद की हिफाजत के लिए संघर्ष ही कर रहे हैं। उनके अनुसार, "आदिम जनजाति विकास के साथ कदमताल नहीं कर सके हैं। यही वजह है कि हमारा वजूद संग्राहलयों में सिमट कर रह गया है। हम शोध के विषय भर बने हैं।"

पार्टी से है मदद का इंतजार

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विमल असुर ये जानकर हैरत में पड़ जाते हैं कि चुनाव लड़ने के लिए 24 लाख तक खर्च करने की अनुमति किसी उम्मीदवार को मिलती है, जबकि उन्हें इसका अंदाजा नहीं कि चुनाव में इससे कई गुना अधिक खर्च किए जाते हैं।

अभी तक विमल ने अपने लिए पोस्टर पर्चे नहीं छपवाए हैं, उनके पास एक ही पासपोर्ट साइज की फोटो है। उन्हें पार्टी की तरफ से इन चीजो के मिलने का इंतजार है।

अलबत्ता उनके मोबाइल पर गांवों से आदिवासी युवकों का फोन आता है, तो वह रोमांचित हो जाते हैं। वह कहते हैं, "मां-बाबा को भी अब तक पता नहीं है कि एक असुर का बेटा चुनाव लड़ने वाला है।
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