UP Election 2022: क्या इस चुनाव में ‘महंगाई डायन’ के खिलाफ उतरेंगी पार्टियां, बढ़ी कीमतों को कौन बनाएगा मुद्दा
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विस्तार
सरसों तेल, आलू-प्याज, टमाटर, सब्जियां, रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतें आम-आदमी के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं। हर चीज की कीमत दोगुनी होने से जनजीवन त्रस्त है। कोरोना काल के बाद सभी क्षेत्रों में बढ़ती महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है।
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या बढ़ती महंगाई राजनीतिक दलों को परेशानी नहीं करती? अगले साल पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं तो क्या राजनीतिक पार्टियों के लिए महंगाई एक मुद्दा हो सकता है? जानकार कहते हैं कि कमजोर विपक्ष अब तक बढ़ती कीमतों को मुद्दा बनाने में असमर्थ रहा है, इसलिए सरकार भी महंगाई को रोकने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं कर रही है। लेकिन महंगाई एक मुद्दा तो है। इतिहास भी गवाह है कि असाधारण रूप से महंगाई जब भी बढ़ी है राजनीतिक उथल-पुथल मची है।
लेकिन पहले जानिए कि महंगाई और पेट्रोल के बढ़ते दामों पर मध्यप्रदेश के कैबिनेट मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया ने रविवार को क्या बयान दिया? एक प्रेस वार्ता में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि इन वर्षों में अगर आमदनी बढ़ी है तो हमें थोड़ी बहुत महंगाई भी स्वीकार करनी चाहिए। अब हर चीज तो सरकार फ्री में दे नहीं सकती क्योंकि सरकार का राजस्व संग्रह भी इसी से होता है तो जनता को ये समझना चाहिए।
एक पूर्व वित्त मंत्री के मुताबिक अगर एक ‘मजबूत विपक्ष’ होता तो महंगाई अब तक एक ज्वलंत मुद्दा बन गई होती। वे मानते हैं कि भले ही आज यह एक शक्तिशाली राजनीतिक मुद्दा न हो, लेकिन लगातार बढ़ती महंगाई आने वाले समय में असंतोष पैदा कर सकती है।
2019 में पिछले लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में महंगाई का बहुत अधिक उल्लेख नहीं था। यह शब्द विपक्षी दल, कांग्रेस के विजन दस्तावेजों में भी गायब था। इसकी वजह यह हो सकती है कि 2014 और 2019 के बीच मंहगाई में कमी आई थी। हालांकि 2014 में चुनाव में यूपीए सरकार के अंतिम सालों में वस्तुओं की बढ़ी कीमतों को भाजपा ने मुद्दा बनाया और इसे अपने विजन दस्तावेज में सबसे प्रमुखता से रखा था।
कांग्रेस शुरू करेगी अभियान
कांग्रेस ने बढ़ती महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफा और खाद्य पदार्थ की बढ़ती कीमतों के विरोध में जनजागरण अभियान शुरू करने का एलान किया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने बीते सप्ताह बताया कि यह अभियान 14 से 29 नवंबर तक चलाया जाएगा। दूसरी तरफ सपा ने भी रसोई पर पड़ी मार को मुद्दा बनाना तय किया है। इसका काम सपा की महिला बिग्रेड को सौंपा गया है।
देश के प्रतिष्ठित बिजनेस पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार परांजय गुहा ठाकुरता कहते हैं कि भाजपा को छोड़कर बाकी सभी दलों के लिए महंगाई एक बड़ा मुद्दा है। हर राजनीतिक दल महंगाई पर बात कर रहे हैं। जिस तरह से पेट्रोलियम पदार्थ, डीजल, रसोई गैस, कर्मशियल सिलेंडर की कीमतें बढ़ रही है, यह हमारी सरकार की आर्थिक व्यवस्था के कुप्रबंधन का नतीजा है जिस पर वे बात नहीं करना चाहते हैं। सिर्फ भाजपा और एनडीए गठबंधन को महंगाई पर कोई चिंता नहीं हो रही है।
'साइलेंट वोट' पड़ सकते हैं
वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार आलोक जोशी बताते हैं कि महंगाई एक गंभीर विषय है और आने वाले चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है। प्रियंका गांधी तमाम रैलियों में महंगाई की बात उठा रही हैं। सपा भी उठी रही है, लेकिन सरकार की कोशिश रहती है कोई और मुद्दा उठा दिया जाए। मौजूदा समय में 265 रूपये प्रति लीटर सरसों का तेल मिल रहा है। पेट्रोल की कीमतें हर शहर में उछाल मार रही है। जो आदमी जमीन पर काम करता है, रोजाना काम पर जाता है, वह सबसे ज्यादा परेशान है। लेकिन लोगों में डर है कि यदि वे इस पर बोलते हैं तो उनका विरोध हो सकता है या उनकी आलोचना हो सकती है। इसलिए लोग चुप रहना पसंद कर रहे हैं, लेकिन जब चुनाव होंगे तो इस मुद्दे पर ‘साइलेंट वोट’ पड़ सकते हैं।
उनके मुताबिक सरकार चाहे तो टैक्स कम करके पेट्रोल-डीजल सस्ता कर सकती है, लेकिन करना नहीं चाह रही। लोग तनाव में है और राजनीतिक पार्टियों को भी यह समझ में आ रहा है कि जात-बिरादरी का समीकरण तो अपनी जगह है लेकिन इस चुनाव में यह एक अहम मुद्दा बन सकता है।
दूसरी तरफ अर्थशास्त्री और ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा यह कहते हैं लोगों की रोजाना की जरूरत की चीजों और उसकी उपलब्धता का अर्थशास्त्र देखना होता है, जो अभी संतुलित दिख रहा है। एलपीजी सिलेंडर और पेट्रोल-डीजल की कीमतें थोड़ी ऊंची हई हैं लेकिन जनता को लगता है कि बाकी चीजें उसे सब्सिडी पर मिल रही है तो कुछ चीजों की बढ़ी कीमतें उसके लिए परेशानी का सबब नहीं है। यह एडस्ट हो रहा है महंगाई के पिछले दो साल का औसत देखते हैं यह काबू में है।
उनका कहना है कि यदि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं तो दूसरी तरफ जनता यह भी देख रही है कि इलेक्ट्रॉनिक स्कूटी में सरकार सब्सिडी दे रही है। आम आदमी को फोन सस्ता मिल रहा है। देश में अभी जितना ईंधन खर्च होता है उसमें पेट्रोल की भागीदारी 10 फीसदी है। चाहे राज्य सरकारें हों या केंद्र सरकार है वे सौर ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है। इस तरह सरकार लोगों का जीवन आसान बनाने के लिए कई और उपायें कर रही हैं।
तनेजा कहते हैं 80 फीसदी भारतीय को सब्सिडी मिल रही है। कई इंसेंटिंव योजनाएं आई है। इसलिए आम आदमी शिकायत नहीं कर रहा है। जब तक मीडिया कुछ नहीं पूछता है तब तक आम आदमी महंगाई को लेकर इसकी शिकायत नहीं करता है। यही वजह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी तमाम पार्टियां इसे मुद्दा नहीं बना पा रही हैैं।
जेपी आंदोलन की बड़ी वजह
1973 में, हॉस्टल मेस के बकाए को लेकर गुजरात में एक कॉलेज का विरोध प्रदर्शन बढ़ती महंगाई के खिलाफ एक आंदोलन में बदल गया, जिसकी वजह से राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इस इस्तीफे के बाद तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ जेपी नारायण के राष्ट्रव्यापी आंदोलन को पंख मिल गए। आखिरकार इसी वजह से इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी। आपातकाल के बाद के चुनावों में गांधी ने सत्ता खो दी, लेकिन उसके बाद बनी सरकार भी कीमतों को नीचे लाने में विफल रही। यहां तक कि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर की लड़ाई ने देश में पहली गैर-कांग्रेसी केंद्र सरकार को समाप्त कर दिया।
यूपीए सरकार के खिलाफ बना था बड़ा मुद्दा
2014 में मोदी के सत्ता में आने से पहले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के अंतिम सालों के दौरान मूल्य वृद्धि के खिलाफ जनमत जुटाने में अरुण जेटली समेत भाजपा के कई नेताओं की भूमिका रही। भाजपा नेताओं ने यूपीए सरकार में महंगाई को मुद्दा बनाया था, सिलेंडर और सब्जियां लेकर प्रदर्शन किया था। वर्तमान सरकार में मंत्रालय संभाल रहे सभी बड़े नेता उस समय सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे। 2014 के चुनाव में भाजपा ‘बहुत हुई महंगाई की मार,अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे के साथ चुनाव में उतरी।