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क्या पैकेज से मिलेगा पानी?
पी. साईनाथ
Updated Tue, 19 Mar 2013 03:43 PM IST
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बात पुणे से शुरू करते हैं, जहां शानदार लाइफस्टाइल वाले सुपर लग्जरी अपार्टमेंट बन रहे हैं। हर अपार्टमेंट, विला और यहां तक कि कुछ बिल्डर्स तो डुपलेक्स पेंटहाउस में भी प्राइवेट स्वीमिंग पूल बना रहे हैं।
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यह एक छोटा सा ट्रेंड है, मगर गर्व से बयां किया जाने वाला यह ट्रेंड पुणे समेत महाराष्ट्र के कई शहरों में देखने को मिल रहा है।
यह सब एक ऐसे राज्य में हो रहा है, जहां पिछले 40 सालों के सबसे बडे़ सूखे से लोग विलाप कर रहे हैं। एक ऐसा राज्य, जहां हजारों गांवों के लोग पानी के टैंकरों पर निर्भर हैं।
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सूखते हुए पोखरों और स्वीमिंग पूल का भले ही कोई सीधा संबंध न हो, लेकिन इस पर थोड़ी चर्चा तो जरूर होनी चाहिए। पिछले दो दशक में राज्य में दर्जनों वाटर पार्क और वाटर-थीम एंटरटेनमेंट पार्क बने हैं।
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दूसरी ओर राज्य के सूखाग्रस्त इलाकों के कई जलाश्यों में 15 प्रतिशत से भी कम पानी बचा है। लेकिन 1972 में पड़े भीषण सूखे की अपेक्षा इस बार यह एक मानव निर्मित सूखा माना जा सकता है।
पिछले करीब 15 सालों से राज्य में बडे़ पैमाने पर पानी औद्योगिक परियोजनाओं में दिया जा रहा है। पानी के इस बंटवारे पर महाराष्ट्र में खून भी बह चुका है।
अगस्त 2011 में पवना बांध से पिंपरी चिंचवाड़ तक पापइलाइन बिछाने का मावल गांव के किसान विरोध कर रहे थे। इस पाइपलाइन के लिए उन किसानों की जमीन अधिग्रहित की जा रही थी। लेकिन पुलिस फायरिंग में 3 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई और 19 लोग घायल हुए थे।
सूखे से ग्रस्त इसी राज्य में पिछले करीब एक दशक में कई गोल्फ कोर्स भी बने हैं। इसमें काफी पानी खर्च होता है। यही नहीं, गोल्फ कोर्स बनाने में कीटनाशकों का खूब इस्तेमाल होता है, जिसका असर आसपास के पानी पर भी पड़ता है।
इसी राज्य में ‘लवासा’ जैसे प्राइवेट प्रोजेक्ट को दिए जा रहे पानी को लेकर भी विरोध हुए हैं। ‘लवासा’ आजाद भारत की पहली ‘हिल-सिटी’ है। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार भी ‘लवासा’ को लेकर खासे उत्साहित रहे हैं।
इस परियोजना की वेबसाइट पर कुछ समय पहले दर्ज था कि इसे 24.6 बिलियन लीटर पानी स्टोर करने की अनुमति है। आर्थिक सर्वे 2011-12 के मुताबिक राज्य में खाद्यान्नों के उत्पादन में 23 फीसदी गिरावट हुई है।
दूसरी ओर खाद्यान्नों की बजाय महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में ही गन्ने की सबसे ज्यादा खेती की जा रही है। गन्ने की खेती में ज्यादा पानी की खपत होती है।
वहीं, शुगर फैक्ट्रियों में हर दिन करीब 90 लाख लीटर पानी का इस्तेमाल होता है। एक एकड़ गन्ने की खेती में खर्च होने वाले पानी से अनाज का उत्पादन करने वाले 10 से 12 एकड़ रकबे की सिंचाई हो सकती है।
महाराष्ट्र का आधे से भी ज्यादा सिंचाई का पानी गन्ने को ही जाता है। जबकि इसकी खेती महज छह फीसदी हिस्से में होती है।
पिछले कई वर्षों के दौरान राज्य में पानी के निजीकरण की कवायद तेज हुई है। जबकि पानी जैसे बुनियादी संसाधन पर समुदाय की पकड़ कमजोर होती चली गई।
हमारे पास कितना पानी उपलब्ध है, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है कि हम उस पानी का इस्तेमाल कैसे करते हैं। यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि पानी का नियंत्रण आखिर किन लोगों के पास है।