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हैदराबादः कायम रहेगी विकास की रफ्तार

Sun, 09 Mar 2014 12:08 PM IST
ज़ुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद से
ज़ुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद से Updated Sun, 09 Mar 2014 12:08 PM IST
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Will be development in the same speed in Hyderabad

तेलंगाना वालों जागो, आंध्र वालों भागो”, यह नारा अलग राज्य आन्दोलन के दौरान तेलंगाना समर्थकों का था। इसका असर आंध्र वालों पर अब भी है। परकाला प्रभाकर हैदराबाद के एक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी हैं और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ भी। वह आंध्र प्रदेश को विभाजित करने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे हैं।

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उनके विचार में यह नारा पिछले दस साल में आंध्र वालों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने में सफल रहा है और अब हैदराबाद के आर्थिक भविष्य पर इसका बुरा असर हो सकता है। वह कहते हैं, “जिन लोगों ने रायलसीमा और सीमांध्र (मौजूदा आंध्र प्रदेश) से हैदराबाद शहर में पूँजी लगाई और उद्योग लगाया, उन्हें डर है कि हम इधर सुरक्षित नहीं रहेंगे तो हमें चले जाना चाहिए। इस वजह से कुछ लोग जा सकते हैं।”
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नए तेलंगाना राज्य के लिए यह बुरी ख़बर होगी। हैदराबाद में पूंजी और पैसा अधिकतर आंध्र वालों के पास है।

'आज़ादी'

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पिछले 40 सालों में शहर में अधिकतर पूंजी और उद्योग इसी शहर में लगाए गए। यह किया रायलसीमा और सीमांध्र वालों ने, जिन्हें अब तेलंगाना वाले बाहर करना चाहते हैं। परकाला प्रभाकर कहते हैं कि अगर हैदराबाद से पूंजी बाहर हो गई तो तेलंगाना राज्य के लिए काफी कठिनाई पैदा हो सकती है।

वह कहते हैं, “40 प्रतिशत कमाई इस शहर से आ रही है लेकिन बिज़नेस इधर का नहीं है। इधर रजिस्टर्ड ऑफिस हैं। अगर आपने यह दफ़्तर विजयवाड़ा या विशाखापत्तनम भेज दिया तो नए राज्य के लिए यह ख़तरा होगा।” हैदराबाद हर तरह से आंध्र प्रदेश की प्रतिष्ठा है, इसकी शान है। पूरे अविभाजित राज्य की 40 प्रतिशत से अधिक कमाई इसी शहर से आती है।

यहां जगमगाती हाई टेक सिटी है जो अमेरिका के सिलिकॉन वैली से कम नहीं। यहाँ का हवाई अड्डा भारत के आधुनिकतम और सुन्दर हवाई अड्डों में से एक है। इसके पास इतिहास है। इतिहासकार सैफुल्लाह कहते हैं कि हैदराबाद को बुनियादी ढांचा देने वाले थे यहाँ के नवाब जिन्होंने शहर में बड़ी इमारतें और संस्थाएं बनाईं जैसे कि उस्मानिया विश्वविद्यालय।

यह भारत के सब से तेज़ी से विकास करने वाले शहरों में से एक है। पिछले दस सालों में इसकी आबादी दोगुनी से अधिक हो गई है। इसकी स्थापना को 400 से ज़्यादा साल हो गए हैं। इस समय इसकी आबादी तक़रीबन 91 लाख है। प्रभाकर के अनुसार बिजली नए राज्य के लिए एक और बड़ी कठिनाई साबित हो सकती है। अधिकतर बिजली घर आंध्र प्रदेश में हैं। बिजली कम होने के कारण नए उद्योग और नए निवेश के आने में कठिनाई होगी।

लेकिन तेलंगाना वाले इन कठिनाइयों का सामना करने को तैयार हैं। क्रिशांक तेलंगाना आन्दोलन में आगे-आगे रहे हैं। वह युवा हैं और नए राज्य का भविष्य भी। वह कहते हैं कि अब तक सरकारी दफ़्तरों में बड़े पदों पर आंध्र वाले रहे हैं जिसके कारण आंध्र वालों को सभी सुविधाएँ दी गईं और तेलंगाना वालों को नज़रअंदाज़ किया गया।

तेलंगाना में कई लोग यह कहते मिले कि अब हमारा मुख्यमंत्री होगा और हमारे लोगों को नौकरियां मिलेंगी। तेलंगाना वाले यह भी कहते हैं कि उन्हें फिलहाल ‘आज़ादी’ मिली है जिसको वह एन्जॉय करना चाहते हैं। एक बेरोज़गार युवती देवी रानी कहती है, “मैं केवल इस बात से संतुष्ट हूँ कि हमें एक अलग राज्य मिल गया। अब नौकरियां हमें मिलेंगी। पहले हमें नौकरियां नहीं मिलती थीं”

सीमांध्र की चुनौतियां

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फिलहाल दस साल तक हैदराबाद दोनों राज्यों की राजधानी होगी। अगर इस दौरान तेलंगाना वालों का ग़ुस्सा ठंडा हुआ तो शायद शहर का विकास वैसे ही जारी रहेगा जैसे अविभाजित राज्य के दौरान होता आया है। लेकिन दूसरी तरफ़ नए राज्य को कम चुनौतियों का सामना नहीं करना है।

आंध्र वाले कहते हैं कि भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि पुराने राज्य को नई राजधानी नए सिरे से बनानी पड़ेगी। नए राज्य को कुछ नहीं करना पड़ेगा। परकाला प्रभाकर कहते हैं कि आंध्र प्रदेश राज्य के सामने सब से बड़ी चुनौती है नई राजधानी बनाना। लेकिन उनके अनुसार “आंध्र प्रदेश के लिए एक तरफ चुनौतियां हैं तो दूसरी तरफ अवसर”।

वह आगे कहते हैं, “चुनौती यह है कि अभी कुछ नहीं है। हाई कोर्ट नहीं है, विधानसभा नहीं है। सचिवालय नहीं है एयरपोर्ट नहीं है। अस्पताल नहीं है। कुछ भी नहीं है”। लेकिन वह कहते हैं इसी में मौका छुपा है, “पिछले 40 सालों में सब कुछ केन्द्रित कर दिया गया हैदराबाद में। नई राजधानी विकेंद्रित होनी चाहिए। आज कल इंटरनेट और हाईटेक का ज़माना है। कोई ज़रूरी नहीं सभी सरकारी इमारतें एक ही शहर में हों।”

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वॉशिंगटन डीसी की तर्ज पर बने नई राजधानी

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इतिहासकार सैफुल्लाह इस तर्क को आगे ले जाकर कहते हैं नई राजधानी दूसरी आने वाली राजधानियों के लिए एक मॉडल बन सकती है अगर इसका निर्माण रचनात्मक तरीके से हो। वह कहते हैं कि मौजूदा राजधानियों में वॉशिंगटन डीसी किसी भी नई राजधानी के लिए बढ़िया मॉडल है।

वे कहते हैं, “नई राजधानी के लिए नेता 2 लाख एकड़ ज़मीन की मांग कर रहे हैं लेकिन वॉशिंगटन डीसी केवल 2000 एकड़ पर बनी है। यह यहां भी संभव है।”

2 जून से दोनों राज्य का प्रशासन और सरकारें अलग हो जाएंगी। सभी विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों राज्यों का भविष्य नए नेतृत्व पर निर्भर करेगा।

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