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क्यों भारी पड़ गए नक्सली
सुदीप ठाकुर
Updated Sun, 26 May 2013 01:27 PM IST
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अप्रैल, 2010 में दंतेवाड़ा के जगरगुंडा इलाके में सीआरपीएफ के काफिले पर हुआ हमला, जिसमें 78 जवान मारे गए थे, सुरक्षा बलों पर नक्सलियों का सबसे भीषण हमला था, तो 25 मई को दरभा क्षेत्र के जीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुआ हमला किसी भी राजनीतिक गतिविधि के खिलाफ सबसे बड़ा नक्सली हमला कहा जा सकता है, जिसमें वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं सहित 30 लोग मारे गए।
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ये दोनों घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि न सरकारें न ही सुरक्षा बल और न ही राजनीतिक संगठन माओवादियों की रणनीतियों और उनकी ताकत को ठीक से आंक सके हैं।
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हर नक्सली हमले के बाद सबसे पहला सवाल यही खड़ा होता है कि सुरक्षा में कहां चूक हुई। खुफिया तंत्र कहां नाकाम हो गया? इस हमले ने एक बार फिर साबित किया है कि सरकारी खुफिया तंत्र के मुकाबले नक्सलियों का अपना आंतरिक तंत्र काफी मजबूत है, जिसके जरिये उन्हें पहले खबर हो जाती है।
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इस हमले को नक्सलियों ने रायपुर से जगदलपुर होकर हैदराबाद जाने वाले नेशनल हाईवे 30 पर अंजाम दिया, जो यह बताने के लिए काफी है कि बस्तर के घने जंगल ही नहीं, हाईवे तक असुरक्षित हैं। बेशक, यह बहुत सकरी घाटी है और दोनों ओर जंगल हैं, लेकिन इसने बस्तर में सड़क सुरक्षा की पोल खोल दी है।
हैरत की बात यही है कि इसी रास्ते से होकर कांग्रेस का काफिला कुछ घंटे पहले सुकमा पहुंचा था। यानी नक्सली पहले से घात लगाए बैठे इस काफिले के लौटने का इंतजार कर रहे थे? कांग्रेस के काफिले में चालीस से पचास गाड़ियां थीं, जिनमें छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ नेता सवार थे।
जानकार कहते हैं कि बस्तर के इस संवेदनशील इलाके में इतने बड़े काफिले के साथ चलने के लिए जरूरी है कि एक ही रास्ते का इस्तेमाल नहीं किया जाए। तो क्या यह सलाह कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को किसी ने नहीं दी?
आदिवासी महासंघ के अध्यक्ष और कोंटा क्षेत्र के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम कहते हैं कि जब पहले ही नक्सलियों ने कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा और मुख्यमंत्री रमन सिंह की विकास यात्रा पर हमले की धमकी दे रखी थी, तब इतने बड़े काफिले के साथ चलते हुए एहतियात बरतने की कहीं अधिक जरूरत थी। वह सुरक्षा बलों की चूक तो मानते ही हैं, उनके मुताबिक कांग्रेस की यात्रा के आयोजकों ने भी कम लापरवाही नहीं बरती।
तो क्या कांग्रेसी काफिले के गुजरने के बाद वहां नक्सली पहुंचे थे। जानकार कहते हैं कि नक्सली कुछ घंटे के भीतर इतने बड़े हमले को अंजाम नहीं दे सकते। मगर यह हमला बताता है कि उनकी तैयारी पहले से भले रही हो, स्थान का चयन एक-दो दिन के भीतर ही किया गया होगा।
गौर करने वाली बात यह भी है कि 25 मई को छत्तीसगढ़ के बस ट्रांसपोर्टरों ने हड़ताल कर रखी थी, जिसकी वजह से इस सड़क पर चलने वाली बसें नदारद थीं, संभवतः इससे भी नक्सलियों को अपनी साजिश को अंजाम देने में मदद मिली। और वैसे भी खुद नक्सलियों ने 26 मई को दक्षिण बस्तर में बंद का ऐलान कर रखा था।
यही नहीं, 26 मई को दक्षिण बस्तर के बीजापुर से ही मुख्यमंत्री रमन सिंह विकास यात्रा का अगला चरण शुरू करने वाले थे। यानी यह क्षेत्र पहले ही राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील हो चुका था।
क्या जेड सुरक्षा नहीं थी कर्मा के साथ?
घटना स्थल से लौटे दक्षिण बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश महापात्र के मुताबिक पहले ही नक्सलियों के निशाने पर रहे महेंद्र कर्मा के साथ परिवर्तन यात्रा में जेड सुरक्षा के जवान नहीं थे। उनके साथ सिर्फ उनके निजी सुरक्षा गार्ड ही थे।
उनके मुताबिक उन्होंने पुलिस अधिकारियों से बात की थी तो पता चला कि पर्याप्त सुरक्षाकर्मी नहीं होने की वजह से कर्मा को सुरक्षा गार्ड मुहैया नहीं कराए गए थे। कांग्रेसी भी यात्रा में पर्याप्त सुरक्षा नहीं होने के आरोप लगा रहे हैं।
यह त्रासदी ही है कि नक्सलियों की धमकियों की वजह से ही कर्मा को जेड सुरक्षा दी गई थी, लेकिन आखिरकार उन्हें नक्सलियों ने ही निशाना बना दिया।
कांग्रेस के काफिले को नक्सलियों ने ठीक उसी तरह तीन तरफ से घेर लिया था, जिस तरह से उन्होंने सीआरपीएफ के जवानों को घेरा था। यानी पिछले हमलों से कोई सबक नहीं सीखा गया है।
अब राजनीति की चुनौती
दरभा घाटी में नक्सली हमले में जिस तरह से कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाया गया, उससे अब एक नए किस्म की चुनौती भी पैदा हो गई है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं को नक्सली पहले भी निशाना बनाते रहे हैं, लेकिन संगठित रूप में यह सबसे भीषण हमला है। मनीष कुंजाम कहते हैं कि बस्तर में राजनीति करना पहले भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं था, लेकिन इस हमले ने अब राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं।