यूपी के शहरों में क्यों दिख रहे हैं बाघ-तेंदुए?
मेरठ शहर में तेंदुआ गुम हो गया है...मुरादाबाद मंडल में बाघिन ने दस लोगों को मार दिया लेकिन अब तक उसे पकड़ा नहीं जा सका। पीलीभीत में भी कुछ दिनों पहले बाघ आ गया था...लखीमपुर में भी तेंदुआ देखा गया।
ये ताजा घटनाएं बयां कर रही हैं कि बाघ-तेंदुए जब तब आबादी की ओर भाग रहे हैं। लेकिन ये बाघ और तेंदुए यूं ही जंगल नहीं छोड़ रहे। दरअसल उनके घर में शोर इतना बढ़ता जा रहा है कि जंगल का राजा घबराहट में है।
यही घबराहट उसे जंगलों से बाहर तक ला रही है। यह खुलासा हुआ है दिल्ली स्थित सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट के सर्वे में। अगर यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में इंसानों की तेजी से बढ़ती आबादी इन जंगली जानवरों के लिए खतरा साबित हो सकती है।
घबराहट में है जंगल का राजा
सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि प्रतिदिन जंगलों में 1.10 करोड़ लोग लकड़ी काटने या अन्य कार्यों से आ जा रहे हैं। करीब सात करोड़ जानवर चरने के लिए जंगलों में जा रहे हैं।
निगहबानी और पिकनिक के लिए में भी बड़ी संख्या में लोग जंगल की सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हैं। जाहिर है कि यह शोर जंगली जानवरों की दिनचर्या पर असर डाल रहा है।
वर्ष 1985 से 1991 तक प्रोजेक्ट टाइगर के डायरेक्टर रहे डा. रामलखन सिंह ने बताया कि दहशत के कारण बाघ आबादी वाले इलाके में भाग रहे हैं।
एक बाघ को चाहिए तीन किलोमीटर का एरिया
एक बाघ को जंगल में कम से कम तीन वर्ग किलोमीटर का एरिया रहने के लिए चाहिए। लेकिन जंगलों पर बढ़ते आबादी के दबाव ने इनका एरिया समेट दिया है। शिकार भी नहीं मिल पाता है।
बाघ के बच्चों की मृत्यु दर तेजी के साथ बढ़ी है। यही कारण है कि वर्ष 2010 में हुए सर्वे में बाघों की संख्या 1706 थी और चार वर्ष बाद हो रही गणना में भी इनकी संख्या केवल 35 ही बढ़ पाई।