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राहुल जगे, लेकिन देर से और थोड़ा

Thu, 07 Aug 2014 05:45 PM IST
सिद्धार्थ वरदराजन वरिष्ठ पत्रकार/बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
सिद्धार्थ वरदराजन वरिष्ठ पत्रकार/बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए Updated Thu, 07 Aug 2014 05:45 PM IST
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why rahul ghandhi turns in to angry young men?

उत्तर प्रदेश में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर बहस कराने से सरकार के इनकार पर बुधवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा में अध्यक्ष के आसन तक पहुंच गए।

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आम चुनावों में बुरी तरह हार मिलने के बाद राहुल की इस आक्रामक शैली को लेकर चर्चा छिड़ गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राहुल गांधी के इस व्यवहार को अपने ही घर में संभावित बग़ावत का नतीजा बताया है।
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कांग्रेस के अंदर ही एक धड़ा प्रियंका गांधी को पार्टी संगठन में लाने की वकालत कर रहा है। मगर क्या वाकई कांग्रेस उपाध्यक्ष अपनी पार्टी को सशक्त नेतृत्व देने का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं?
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क्या राहुल गांधी इस साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी को फिर से संगठित कर पाएंगे? या उनके ये तेवर केवल भाई-बहन के बीच की प्रतिद्वंद्विता भर है?

चाहिए इंदिरा गांधी जैसा नेतृत्व, प्रियंका में दिखते हैं गुण

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दूसरे, यह बहुत स्पष्ट नहीं है कि राहुल गांधी का बिफरना, राजनीति और सत्ता के प्रति उनके नज़रिए में वास्तविक बदलाव का द्योतक है।

संसद में नेतृत्वकारी भूमिका ग्रहण न करने को सही ठहराने के लिए जो तर्क उन्होंने दिए, वो यह है कि वह पार्टी संगठन को फिर खड़ा करने पर ध्यान लगाएंगे।

अभी तक कम से कम, हमने इसके बहुत कम सार्वजनिक साक्ष्य देखे हैं। वास्तव में, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे प्रमुख राज्यों में इस वर्ष के अंत तक चुनाव हैं, जहां कांग्रेस को विश्वसनीय प्रदर्शन की काफ़ी ज़रूरत है।

महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों में प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व विशुद्ध वोट बैंक की राजनीति कर रहा है। अपनी उम्मीद बरकरार रखने के लिए महाराष्ट्र में आरक्षण का कार्ड और हरियाणा में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का कार्ड चला जा रहा है।

पूरे देश में, पार्टी में मतभेद बढ़ रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की राजनीतिक हैसियत बढ़ाने के लिए इंदिरा गांधी जैसी कोई शख्सियत राज्यों में पार्टी को मज़बूत करने के साथ-साथ संसद में प्रतिपक्ष के नेता होने का फ़ायदा उठाती।

हालांकि, वर्तमान उपाध्यक्ष से ऐसी भूमिका को लेकर किसी को उम्मीद नहीं है। टीवी पर एक बयान देना ही नेता का गुण नहीं होता।

अपनी ही मौत के बारे में मार्क ट्वेन के प्रसिद्ध उद्धरण की व्याख्या करें तो राहुल गांधी के उभरने की अफ़वाह बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई है।

वाकई पार्टी को नेतृत्व देने में हैं सक्षम

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उत्तर प्रदेश में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर बहस कराने से सरकार के इनकार पर बुधवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा में अध्यक्ष के आसन तक पहुंच गए।

आम चुनावों में बुरी तरह हार मिलने के बाद राहुल की इस आक्रामक शैली को लेकर चर्चा छिड़ गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राहुल गांधी के इस व्यवहार को अपने ही घर में संभावित बग़ावत का नतीजा बताया है।

कांग्रेस के अंदर ही एक धड़ा प्रियंका गांधी को पार्टी संगठन में लाने की वकालत कर रहा है। मगर क्या वाकई कांग्रेस उपाध्यक्ष अपनी पार्टी को सशक्त नेतृत्व देने का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं?

क्या राहुल गांधी इस साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी को फिर से संगठित कर पाएंगे? या उनके ये तेवर केवल भाई-बहन के बीच की प्रतिद्वंद्विता भर है?

राहुल ने दिखाया कमजोर नेता हैं वो

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नेता के गुण की परीक्षा केवल महान विजय हासिल करने की उसकी क्षमता से ही नहीं की जाती, बल्कि इससे भी होती है कि वह पराजय कैसे स्वीकार करता है।

एक ऐसे राजनीतिक अभियान का नेतृत्व करने के बाद, जिसमें उनकी पार्टी ने अभी तक का सबसे बुरा हश्र देखा, कांग्रेस उपाध्यक्ष और ऊपरी तौर पर पार्टी के वारिस राहुल गांधी ने हिचकिचाहट के साथ अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार की थी, लेकिन इसके तुरंत बाद ही वह संसद की पिछली सीट की आरामदायक छाया में सिमट गए।

कुछ मामलों में तो इसके अलावा कुछ नहीं हो सकता था। अगर कांग्रेस को राजनीतिक भरपाई की उम्मीद रखनी है तो लोकसभा में संख्याबल में अजेय भारतीय जनता पार्टी की सरकार को विश्वसनीय और सशक्त चुनौती देना उसकी ज़रूरत है और उसे ऐसे नेता की ज़रूरत है जिसकी नीतियों और प्रक्रिया पर पूरी पकड़ हो।

मोर्चे से पीछे हटने का चुनाव करके राहुल गांधी दुनिया को बता रहे थे कि वह असल में ऐसे शख़्स नहीं हैं।


पीछे हटे राहुल, प्रभावहीन नेता को लेनी पड़ी चुनौती

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एकमात्र समस्या, जिसे पूरी दुनिया जानती है, वो यह है कि पार्टी और 'हाईकमान' इसे कुबूल करने को तैयार नहीं हैं। राहुल के पीछे हटने की इस संकटपूर्ण स्थिति में नेतृत्व के बारे में नज़रिए पर पुनर्विचार के मौके के बतौर देखने के बजाय कांग्रेस ने वयोवृद्ध लेकिन प्रभावहीन मल्लिकार्जुन खड़गे को लोकसभा में अपना नेता घोषित कर दिया।

सदन में पार्टी ने विकल्पों के चुनाव में अनाड़ीपन दिखाया, जबकि राज्यसभा में नरेंद्र मोदी सरकार का जीना दूभर करने के लिए उसने कुशल राजनीतिज्ञों के बजाय मुख्य रूप से संख्या बल पर भरोसा किया।

हालांकि नेता प्रतिपक्ष के रूप में औपचारिक मान्यता की कांग्रेस की मांग में काफ़ी दम है पर, कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष पद की बहस को उद्देश्य की बनिस्बत विशेषाधिकार के सवाल तक सीमित कर दिया।

नौसखियापन है या है शुरुआती हमला?

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तो बुधवार को राहुल गांधी की इस आक्रामकता के बारे में हम क्या कहें, जब उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर बहस से सरकार के इनकार पर प्रदर्शन के लिए वह कांग्रेस सांसदों के साथ लोकसभा अध्यक्ष के आसन तक पहुंच गए?


संसद के बाहर संवाददाताओं से बात करते हुए राहुल ने कहा, ''संसद में ऐसा मत है कि देश में हर चीज़ के लिए केवल एक व्यक्ति की आवाज़ ही मायने रखती है।''

ग़ुस्से में भरे उनके ये शब्द साफ़ तौर पर भाजपा, सरकार और संसद पर नरेंद्र मोदी की पकड़ के बारे में हों, लेकिन क्या ये एक नौसिखिए की नाराज़गी का नतीजा भर था या यह नेतृत्व की विश्वसनीयता स्थापित करने का दृढ़ निश्चय कर चुके शख़्स का शुरुआती हमला था?

उठ रही है प्रियंका को लाने की आवाज

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कांग्रेस के एक धड़े में प्रियंका गांधी को पार्टी में लाने की वकालत को लेकर मीडिया में आई ख़बरों के बाद, आने वाले दिनों में भाई-बहन के बीच प्रतिद्वंद्विता की अभिव्यक्ति के रूप में राहुल गांधी की आक्रामकता देखना दिलचस्प होगा।

वास्तव में, वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली ने कांग्रेस उपाध्यक्ष पर घर में आसन्न 'तख्तापलट' के कारण 'बेवजह के मुद्दे' पर क्षुब्ध होने का आरोप लगाया। गांधी परिवार से इतर सोचने की कांग्रेस की निराशाजनक अक्षमता को किनारे कर दें तो भी इन दोनों अनुमानों को दो कारणों से बहुत ज़्यादा हवा मिली।

पहला, नेता के रूप में राहुल गांधी की असफलता जितना उनकी अपनी सीमाओं का नतीजा है उतना ही कांग्रेस में सोनिया गांधी की प्रबंधकीय क्षमता ने भी उनकी राह में रोड़ा खड़ा किया है।

राहुल गांधी के उग्रसुधारवाद और उनकी मां की सतर्कता के बीच, सूबा दर सूबा पार्टी संगठन पूरी तरह मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुका है।

राहुल गांधी चुनावों में कांग्रेस का चेहरा बन गए थे पर ''पार्टी में किसी भी मसले के लिए केवल एक महिला की आवाज़ ही मायने रखती थी।'' और यह आवाज़ बेटी को बेटे के ख़िलाफ़ जाने नहीं देगी।

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